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तेरा क्या होगा दस्तखत ब्रिगेड

सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार

कितना न समझाया था अपने प्रिय कॉमरेड लेखक को कि हे साथी, आए दिन की दस्तखतबाजी वाली बुरी आदत को छोड़ दे। इस गलतफहमी में मत रह कि इधर तू जनता से कहेगा कि इसे वोट न कर और वह तुरत मान लेगी। हे साथी लेखक, जरा सा आत्मावलोकन कर कि तू है क्या?

तू क्या अपने को कोई पहुंचा हुआ ज्ञानी-ध्यानी, संत-महात्मा, ऋषि-मुनि समझता है कि तू कहेगा, तो जनता मान लेगी और तेरे बताए बिना उसे मुक्ति नहीं मिलेगी? तू क्या कोई प्लेटो है या अरस्तू है? कोई देकार्त है या कोई कांट? क्या तू अपने को विवेकानंद समझता है या कि गांधी समझता है या कि तू ओशो है या कि सिर्फ ‘सोसो’ है? तू क्या कोई मसीहा है कि तू ज्यों ही कहेगा कि जनता ‘इधर चल’, तो जनता इधर चल देगी। तू कहेगा कि ‘उधर चल’, तो वह उधर चल देगी।

तेरे पीछे तो तेरी छाया तक नहीं चलती, जनता क्या चलेगी? तेरे इन दस्तखतों की जरूरत किसे है? यूं भी हे साथी, तू ही तो कहता रहा है कि संकट के समय हमें हमेशा जनता-जनार्दन के पास जाना चाहिए और उससे घुलना-मिलना चाहिए, उसी जैसा हो जाना चाहिए और इस तरह उससे सीखना चाहिए। हमें मजदूर से सीखना चाहिए। हमें किसान से सीखना चाहिए। गरीबों से, शोषितों और उत्पीड़ितों से सीखना चाहिए।

तू ही तो कहता आया है कि जनता अनाड़ी नहीं होती। वह सब कुछ जानती है, अच्छे-बुरे को खूब पहचानती है। तू ही तो कहा करता था कि जनता जो करती है, सही करती है। वही सब कुछ करती है। वही समाज को बनाती है। वही देश चलाती है। वही राष्ट्र बनाती है। वही अपने नेता चुना करती है। वही जनतंत्र की धुरी है। वही अपनी सरकार चुना करती है और उसको सही लाइन पर रखती है।

हे जनवादी मित्र, क्या तू भूल गया कि तू ही हर सांस में ‘जन-जन’ की बात करता रहता था, ‘जनवाद-जनवाद’ चिल्लाता रहता था। हर बात में ‘जनता-जनार्दन’ का मंत्र जपता रहता था और अब भी जपता रहता है। तू ही तो बार-बार कहता रहा कि जब भी दिशा न मिले, जनता के पास जाओ, उससे सीखो, उससे दीक्षा लो, वही तुमको मार्ग दिखाएगी।

और अब, जब-तब दस्तखत करके उसी जनता को यह सिखाने के चक्कर में रहता है कि तू यह कर, यह न कर। यह ‘जनता’ का अपमान नहीं तो और क्या है? जनता से प्यार का क्या तेरा यही तरीका है? क्या तेरी कविता-कहानी ने अपनी जनता बनाई? क्या तूूने कभी अपनी जनता को बनाया? हे बिरादर, बुरा न मानना, तेरे जैसा लेखक ‘जनता-रहित’ लेखक है। किसी भी लेखक के पास उसकी जनता नहीं है, न वह उसे बना सकता है, लेकिन समझता अपने को गोर्की और प्रेमचंद है। तेरी इस ‘ग्रेटनेस’ के, तेरी इस ‘महानता’ के क्या कहने?

मुश्किलों बाद एक संकलन छपा, तो बिका नहीं। बिका, तो दिखा नहीं। दिखा, तो किसी ने पढ़ा नहीं। गोष्ठियों में वही 20-40 थकेले-पकेले ‘अद्भुत-अद्भुत’ जपते, एक-दूसरे को चढ़ाने-गिराने में लगे हुए चेहरे। एक से एक फेसबुक वीर। इधर एक लाइन लिखी, उधर दो इनाम झटके और तुरंत फ्री की ‘फॉरेन ट्रिपों’ की जुगाड़ में ‘आत्म-संघर्ष’ करने लगे। यही है अपनी दस्तखत ब्रिगेड। जनता को हांकने के लिए तुमने कर दिए दस्तखत। दे दी लाइन। और अब देख, तेरे दस्तखतों का कैसा कलाबत्तू बनाया है जनता ने। अब तेरा क्या होगा दस्तखत ब्रिगेड?

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