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7 अप्रैल, 2020|12:48|IST

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आलोचना के नए प्रतिमान 

अगर आप आज के साहित्यकार हैं, तो तय मानिए, आप इस सृष्टि पर एक एहसान हैं। इस समाज को हमेशा आपका कृतज्ञ रहना है। यह भी तय मानिए कि आप कोई मामूली आदमी नहीं हैं, आप तो धरती पर साहित्य के साक्षात अवतार हैं, और उसी तरह महसूस करिए-कराइए।
आप फेसबुक पर हैं, इसलिए आप बड़े साहित्यकार हैं। आप ट्विटर पर हैं, इसलिए आप बड़े साहित्यकार हैं। आप बड़े साहित्यकार हैं, क्योंकि आपकी फ्रेंड्स-लिस्ट में एक से एक बड़ा नाम शामिल है। आप महान हैं, क्योंकि आप किसी बड़े की फ्रेंड्स-लिस्ट में हैं। क्या किसी कालिदास को कभी इतने लाइक्स आए? क्या किसी भवभूति को उनके समय में किसी ने इतनी घास डाली? कहां वे और कहां आप? 
वे जमीन पर थे। आप साइबर स्पेस में हैं। वे रीयल में थे, आप वर्चुअल में हैं। वे स्थानीय थे, आप ग्लोबल हैं। उनके पास सिर्फ फेस था, आपके पास ‘फेसबुक’ है। वे दरबार में थे या जंगल में या मंदिर में। आप यू-ट्यूब पर हैं, वाट्सएप पर हैं, ट्विटर-इंस्टाग्राम पर हैं। 
वे भी कोई साहित्यकार थे? बरसों रस-छंद-अलंकार का अभ्यास करते रहते। अपने गुरुओं, काव्य-शास्त्र के आचार्यों की दिन-रात सेवा करते, अभ्यास करके उनको दिखाते, गलती देख वे मुर्गा बनाते, फिर भी चेले चुपचाप आज्ञा मानते, फिर समस्या-पूर्ति का कॉम्पिटीशन जीतते और तब जाकर दो लाइन लिखने लायक माने जाते। जब जीवन बे-छंद हुआ, तो भी मेहनत से पीछा न छूटा। साहित्यकार बनने के लिए संस्कृत, अंग्रेजी, फारसी भाषाएं सीखनी पड़तीं। इनके साहित्यकारों को पढ़ना होता। फिर जब जीवनानुभव बढ़ता, तब रचनात्मकता का अंकुर फूटता। आचार्य द्विवेदी को दिखाना होता। वे काट-पीटकर वापस करते, तो ठीक करना पड़ता, तब जाकर दो-चार लाइनें छप पातीं।
इसके बाद आए प्रगतिवादी दौर में अरबी, फारसी, संस्कृत की जगह माक्र्सवाद ने ले ली। साहित्यकार होने के लिए विचारधारा का अवगाहन करना पड़ता। गरीब, मजदूर, किसान, सर्वहारा संघर्ष को समझना होता। उनसे हमदर्दी करनी होती। तब जाकर कोई शर्मा या कोई सिंह उनकी तारीफ करता और वह साहित्यकार प्रगतिशील परंपरा में माना जाता। 
अब इस सबकी भी जरूरत नहीं। आप किसी बड़े नामी लेखक को ठोक दीजिए। उस पर कोई आरोप लगा दीजिए। उसका चरित्र-हनन कर दीजिए। उसके बारे में कुछ गंदी-संदी अफवाह उड़ा दीजिए। उसको नकली कह ‘दो टके का’ बता दीजिए। इसके बाद सोशल मीडिया में आप ही आप होंगे। अगर साहित्यकार बनना है, तो बदतमीजी को सबसे बड़े कलात्मक औजार की तरह यूज कीजिए। अपने गालीकोश का पिटारा खोल दीजिए और जो आपका टारगेट है, उस पर चिपकाते जाइए। 
किसी नामी साहित्यकार को ‘सॉफ्ट टारगेट’ चुन लीजिए। स्वर्गवासी है, तो और बेहतर। न वह जबाव देने आ सकता है, न मानहानि का केस कर सकता है। बदतमीजी करना, गरियाना, हेट-मेल मारना, निंदा करना, ट्रोल करना-कराना, कुत्सा, कोसना आदि के इस्तेमाल से अदना साहित्यकार भी ‘टारगेटेड’ साहित्यकार से बड़ा साहित्यकार तुरत ही बन जाता है।  
गाली समकालीन आलोचना का सबसे बड़ा मानक है। जिसे दी जाती है, वह रक्षात्मक हो जाता है, और जो देता है, वह परम साहसी और साहित्यवीर कहलाने लगता है।
यही हैं ‘आलोचना के नए प्रतिमान’, जो आज के बहुत से लंपटालोचकों द्वारा सोशल मीडिया पर गढ़े जा रहे हैं।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 26 january