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तीसरी परंपरा की खोज

सुधीर पचौरी

पहले ने खोजी पहली परंपरा। दूसरे ने खोजी दूसरी परंपरा। इतनी बड़ी भाषा और इतना संकीर्ण नजरिया कि उसे सिर्फ दो परंपराओं में निपटा दिया गया।
ऐसा घोर अन्याय कैसे होने दिया जा सकता है? इसीलिए मैं खोज रहा हूं ‘तीसरी परंपरा’। पहली परंपरा की मूंछें थीं। दूसरी परंपरा के पास भी मूंछें थीं। अपन बेमूंछ हैं। इसलिए यह कहलाएगी बेमूंछ परंपरा। पहली परंपरा बनारसी थी। दूसरी डबल बनारसी थी। तीसरी है दिल्ली के मयूर विहार वाली। पहली के खोजी रहे आचार्य रामचंद्र शुक्ल। दूसरी के खोजी रहे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, लेकिन इसे खोजकर बताया उनके चेले नामवर सिंह ने दूसरी परंपरा की खोज  में और अब तीसरी के खोजी हैं विनम्र साहित्य के सतत डिसरप्टाचार्य पचौरी जी हाथरसी-दिल्ली वाले। खेद है कि मुझे अपना नाम पूरी विनम्रता के साथ अपने आप लेना पड़ रहा है। हिंदी के आइडिया चोरों का डर न होता, तो नहीं लेता। अब तक हिंदी साहित्य पर बनारसी स्कूल छाया रहा या फिर इलाहाबादी-लखनवी स्कूल छाया रहा। अब छाएगा अपने वाला ‘पोस्ट मॉडर्न दिल्ली स्कूल’। हिंदी को कभी तो अपनी फिफ्टी-फिफ्टी छाप मॉडर्निटी से बाहर आकर ‘पोस्ट मॉडर्न’ बनना ही होगा। 
दिल्ली छोड़कर कहीं रखा क्या है? परीक्षा गुरु  जैसा दिल्ली केंद्रित उपन्यास लिखने वाले लाला श्रीनिवास दास थे दिल्ली वाले। जैनेंद्र तो पुराने दिल्ली वाले थे ही। दो-चार और भी रहे दिल्ली वाले। बाकी आज कोई 60-70 साल पुराना दिल्ली वाला है, कोई 20 से 40 बरस पुराना दिल्ली वाला है। कोई दस-पांच बरस पुराना है, तो कोई जैसे कल ही आया है। कोई बीमार पड़ता है, तो ठीक होता है दिल्ली में। पुस्तक का लोकार्पण कराता है, तो दिल्ली में। अब कोई नहीं कहता कि ‘दिल्ली दूर अस्त’। अब तो सभी के पास अपनी-अपनी दिल्ली है। पर जरा सोचिए, जो दिल्ली के पास है, आज वह किसके पास है? 
सारे बड़े साहित्य सम्मान हैं, तो दिल्ली में। दो-दो अकादेमियां हैं, तो दिल्ली में। बडे़ रचनाकार हैं, तो दिल्ली में। दो-दो सरकारें हैं, तो दिल्ली में। संसद है, तो दिल्ली में। सबसे बडे़ नेता हैं, तो दिल्ली में। सबसे बड़े विद्वान हैं, तो दिल्ली में। आईआईसी है, तो दिल्ली में। हैबिटेट है, तो दिल्ली में। कमानी, त्रिवेणी कला संगम है, तो दिल्ली में। एनएसडी है, तो दिल्ली में।
खड़ी बोली के पहले कवि अमीर खुसरो रहे, तो दिल्ली में। उर्दू के महाकवि मीर और गालिब रहे, तो दिल्ली में। सारे बड़े प्रकाशक हैं, तो दरियागंज, दिल्ली में। गांधी समाधि है, तो दिल्ली में। रहीम का स्मारक है, तो दिल्ली में। आजादी की पहली जंग का शायर बादशाह हुआ, तो दिल्ली में। पृथ्वीराज रासो  के नायक रहे, तो दिल्ली में। विवाद हैं, तो दिल्ली में। संवाद है, तो दिल्ली में। क्या नहीं है अपनी दिल्ली में? सबसे अधिक विश्वविद्यालय हैं, तो दिल्ली में। सबसे अधिक कॉलेज हैं, तो दिल्ली में। सबसे अधिक कवि-कथाकार, आलोचक-पत्रकार हैं, तो दिल्ली में। 
मेरी दिल्ली इतनी महान, लेकिन उसकी एक परंपरा तक नहीं? बहुत अन्याय है!
इसीलिए मैंने तय किया कि हिंदी साहित्य की ‘तीसरी परंपरा’ जरूर खोजूं, जो दिल्ली से शुरू होकर सारे देश में घूमकर दिल्ली पर ही खत्म हो। जब दिल्ली के बिना हिंदी साहित्य का कोई काम नहीं होता, तो उसकी परंपरा क्यों न खोजी जाए?
यही होगी अपनी ‘तीसरी परंपरा खोज’।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 23 december