DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

शताब्दी मनाके जाना जी

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकार

दिल्ली अपने साहित्यकारों को भूलने लगी है। अब न कोई शताब्दी मनाता है, न बरसी। ़दिल्ली में सन्नाटा है। यह वर्ष प्रगतिवादी आलोचक शिवदान सिंह चौहान का शताब्दी वर्ष है, लेकिन दिल्ली अब तक खामोश है।
प्रगतिशील आंदोलन के एक बड़े नाम प्रकाशचंद्र गुप्त की शताब्दी तो दस साल पहले निकल गई। रामविलास शर्मा की शताब्दी छह साल पहले निकल गई और दिल्ली को खबर तक न हुई। शिवमंगल सिंह सुमन की शताब्दी तीन साल पहले निकली, अमृतलाल नागर की दो बरस पहले निकल गई। यह वर्ष महापंडित राहुल सांकृत्यायन और शिवपूजन सहाय की सौवीं जयंती का है। अब शताब्दी वर्ष चुपके से  निकल जाते हैं, कोई बताता तक नहीं। लगता है, हिंदी वाले दो-चार की मनाकर ही थक गए।
कौन मनाए? देखते रहो कैलेंडर। पता लगाते रहो वंशजों का। मांगते रहो इस-उस से फंडिंग। जिसका नाम लेने से कुछ मिले, उसी की मनती है। जिससे कुछ न मिले, उसका नाम क्या लेना? मुझे तो ऊपर लिखे नामों के परिजन अधिक समझदार लगते हैं कि किसी ने शताब्दी मनाने की गलती नहीं की और किसी को कष्ट नहीं दिया। वरना हिंदी तो उन चिर यश:प्रार्थियों की भाषा है, जो दूसरों के बहाने जीते जी अपनी शताब्दी मनाने के चक्कर में रहते हैं।
वैसे जीते जी शताब्दी मनाने का आइडिया उतना बुरा है भी नहीं, जितना हम समझ रहे हैं। कोई अपनी शताब्दी जीते जी मनाना चाहे, तो मना ही सकता है। आजकल तो कई लोग अपना अंतिम संस्कार अपनी आंखों के आगे करवाने लगे हैं। जीते जी तेरहवीं तक करवाके जाते हैं कि पता नहीं, उनके बाद कोई करवाए या न करवाए? बच्चों का क्या पता? 
लेखक से ज्यादा एहसान फरामोश कोई दूसरा नहीं। लिखता है, तो सत्ता को कोसता है। नहीं लिख पाता है, तो बच्चे व बीवी को कोसता है और लिखने के बाद जनता को कोसता है कि पढ़ती नहीं है। और अगर कोई पढ़ लेता है, तो कोसता है कि पढ़ा तो, लेकिन समझा नहीं। 
हिंदी का लेखक स्वभाव से ही झंझटिया होता है।एक न एक झंझट लिए ही रहता है। भुगतना बच्चों को पड़ता है। बीवी-बच्चों की नजरों में उसकी कोई खास वेल्यू नहीं होती। वे उसे आफत की तरह झेलते हैं, इसीलिए घर वाले अपने बाबूजी या पापा या दादा की शताब्दी मनाने के चक्कर में नहीं पड़ते। 
ऐसे झंझटिया लेखकों की शताब्दी मनाने के चक्कर में वही पड़ सकता है, जो अपनी शताब्दी मनवाने के मोह में फंसा हो। वह दूसरों की शताब्दी इसीलिए मनाता है कि उसकी भी मने। लेकिन, अब किसी को परेशान होने की जरूरत नहीं। एडवांस में और जीते जी मना लें। दस-बीस लाख का बजट रिजर्व रखें। ज्यादा माल हो, तो एक ट्रस्ट बना लें। हिंदी में कुछ लेखक ट्रस्टी बनने के लिए ही जीवन धारण किए हैं, सो उनके भरोसे रहें। अगर आपका बजट ठीक-ठाक है, तो मनेगी, नहीं तो भूल जाइए। शताब्दी वाला बजट नहीं झेल सकते, तो ‘लघु संस्करण’ मनाएं। अपनी स्मृति में एक ‘युवा लेखक सम्मान’ घोषित कर सकते हैं। युवा आलोचक सम्मान, युवा कथाकार सम्मान, युवा कवि सम्मान आदि कुछ भी। एक बढ़िया सा कलर फोटो पीछे छोड़ना न भूलिएगा। वरना ये हिंदी वाले आपके माल पर किसी और के फोटो की ऐश करवा सकते हैं। फिर कह देंगे कि आपके गम में हमसे यह गलती हो गई।
इसीलिए कह रहा हूं कि जीते जी शताब्दी मनाके जाना।किसी का क्या भरोसा कि बाद में याद करे या न करे? 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 22 july