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भई गति सांप छछूंदर केरी

सुधीर पचौरी

यह क्या हुआ? जिन मोदी जी को हिंदी के प्रगतिशील साहित्यकार नापसंद करते हैं, उन्हीं को नामवर जी ‘प्रिय’ नजर आए। उन्होंने ऐन टाइम पर नामवर जी को श्रद्धांजलि दे दी और सारी खबर लूट ली। जब से यह खबर आई है, तब से मैं तो सकते में हूं। यह क्या हो रहा है? इतना बड़ा कांड हो गया और अभी तक एक प्रगतिशील कंठ विरोध में नहीं फूटा। यह तो प्रगतिशील परंपरा के विपरीत है। याद करिए, जब यूपी में योगी जी की सरकार नहीं थी, तब उनके हाथों से हिंदी का एक जादुई किस्म का कथाकार न जाने किस जादुई तरकीब से एक सम्मान झटक ले गया। तब तो बड़ी हाय-हाय मची थी। लेकिन इस बार चूं तक नहीं।
इससे तो अच्छे जयपुुरवाले प्रगतिशील हैं, जो यूं तो किसी से समझौता नहीं करते और अगर करते भी हैं, तो देर तक जस्टिफाई करते हैं कि यह समझौता नहीं था, यह तो नई सांस्कृतिक क्रांति थी। मैं तो इसी प्रगतिशीलता का कायल हूं कि सब कुछ करो, मगर तर्क देकर करो। लेकिन इस बार जो चुप्पी प्रगतिशीलों ने लगाई है, उससे मुझे तो डर लगने लगा कि ऐसा ही रहा, तो महान प्रगतिशील परंपरा का आखिर क्या होगा? आज स्वयं मुक्तिबोध पूछ रहे हैं- तय करो किस ओर हो तुम?  यानी पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?
बड़े पसोपेश में हूं। चुप लगाता हूं, तो पेट में वैचारिक मरोड़ उठती है। बोलता हूं, तो अचूक अवसरवादी कहलाने का खतरा है। जिन वीरों ने अकादेमी तक लौटा दी, वे भी इस कदर चुप हैं कि लगता है, मुंह में जुबान नहीं। यूं तो श्रद्धांजलि राहुल जी ने भी दी है, राष्ट्रपति जी ने भी दी है, राजनाथ सिंह जी ने भी दी है, और अपने कॉमरेड सीताराम येचुरी ने भी दी है। लेकिन असल कसक यह है कि इस बार यह सीधे टॉप से आई है। बताइए इसका क्या करें?
राहुल दें, यह समझ में आता है। सीताराम दें, तो घर की ही बात हुई। राष्ट्रपति जी दें, तो भी समझ में आता है कि वह सबके हैं। लेकिन जिनसे प्रगतिशील ‘लेखक’ इतने दिनों से ‘संघर्ष’ करते आ रहे हैं, वह अगर दें, तो इस स्थिति को भला क्या कहें? इसे कहते हैं- ‘भई गति सांप छछूंदर केरी’। न लेते बनती है, न लौटाते बनती है।
जिस हिंदी में जरा-जरा सी बात पर किसी को समझौतावादी, किसी को घनघोर प्रतिक्रियावादी, किसी को संशोधनवादी कहने का चलन रहा है, जिस हिंदी में जरा-जरा सी बात पर फतवे जारी होते रहे हैं, वही हिंदी इस कदर चुप है कि लगता है, यह धरती अब वीर-विहीन हो चली है।
एक जमाना था कि साहित्य में राजनेता आया नहीं कि हाय-हाय हुई नहीं, और अब तो यह जमाना है कि निगाहें श्मशान घाट के दरवाजे की ओर लगी रहती हैं कि कौन पहुंचा और कौन नहीं पहुंचा? अब तो मरना भी तीन सितारा, पांच सितारा, सात सितारा कहलाने लगा है। शोक तक में कॉम्पिटिशन होने लगा है। किसकी श्रद्धांजलि आई, किसकी न आई, कितने चैनल आए? सब इसी का हिसाब करते रहते हैं।
हम तो कहेंगे कि एक श्रद्धांजलि ने नामवर के शोक को भी सात सितारा बना दिया। इसे कहते हैं- विरुद्धों का सामंजस्य। ऐसे सामंजस्य का सौभाग्य मैं तो कहता हूं कि सबको मिले।
जाते-जाते भी नामवर हिंदी का कल्याण कर गए। उसे कथित वैचारिक संघर्ष से ऊपर उठा गए। बाकी कसर सबसे बड़ी श्रद्धांजलि ने पूरी कर दी। सच कहा है- पानी ही ते हिम भया, हिम ही गया बिलाय/ कबिरा जो था ,सोई भया, अब कछु कहा न जाय।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 22 february