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मेरा खूंटा वहीं अड़ा

सुधीर पचौरी

नेता बदले तो ठीक, अभिनेता बदले तो ठीक, विक्रेता बदले तो ठीक, क्रेता बदले तो भी ठीक। कल तक जो सेकुलर था, अचानक कम्यूनल पाले में चला गया तो ठीक। जो कल तक कम्यूनल था, वह सेकुलर पाले में आ गया तो ठीक। इसी तरह कवि बदले तो ठीक। कवि का बदलना स्वाभाविक है। कवि  स्वभाव से चंचल होता है। यथार्थ बदलता है, तो कवि भी बदल जाता है। यूपी या बिहार में कवि जातिवादी रहे तो ठीक, दिल्ली में आते ही जाति के साथ प्रगतिवादी हो जाए तो ठीक। 
लेकिन आलोचक जरा सा भी इधर-उधर हो जाए, तो कुफ्र से कम नहीं। तुरंत फतवा जारी कर दिया जाता है, देखो तो कैसा अवसरवादी निकला। कवि अवसर के अनुसार बदल जाए, जरा-जरा से सम्मान के लिए इस-उस की चापलूसी करे, इस-उस घर के चक्कर काटे, तो सब ठीक, लेकिन आलोचक जरा भी हिला, तो वह हमेशा के लिए गया।
साहित्य साहित्य नहीं, एक खूंटा हो गया कि एक बार बंधे, तो वहीं बंधे रहें। रचनाकार अपना खूंटा उखाड़कर इधर-उधर ले जाए, तो समय का यथार्थ कहने वाला और आलोचक खूंटे से जरा इधर-उधर हुआ, तो अवसरवादी। जब सब अपना खूंटा बदल सकते हैं, तो आलोचक ने ही क्या बिगाड़ा है? उसे भी खूंटा बदलने का हक है। यूं भी जो नहीं बदलता, सड़ जाता है। 
एक बार बादशाह अकबर ने बीरबल से एक पहेली पूछी कि बताओ, पान सड़ा क्यों, घोड़ा अड़ा क्यों? बीरबल ने जबाव दिया, हुजूर ‘फेरा’ न था। यानी अगर इधर-उधर घुमाते, हवा-पानी बदलते, चलाते-फिराते, तो न पान सड़ता, न घोड़ा अड़ता। लेकिन इधर तो अड़ना और सड़ना ही आदर्श है। बहुत से हिंदी लेखकों का घोड़ा आज भी वहीं अड़ा है, जहां पचास में अड़ा था। गांव बदल गए। शहर बदल गए। गली बदल गई। सड़क बदल गई। मोहल्ले बदल गए। फोन बदल गए। साइकिल-स्कूटर गए, नई बाइक और नई कार आ गई। नेटवर्क आ गया। वाई-फाई आ गया। सब डिजिटल हो गया। लेकिन लेखक जी का विचार वहीं का वहीं रहा।
कल तक वाली समूची ‘उत्तर आधुनिकता’ आज के स्मार्टफोन में समा गई। हर बंदा ग्लोबल हो गया। हर बंदा लोकल हो गया। हर बंदा ‘ग्लोकल’ हो गया। लेकिन हिंदी की न सोच बदली, और न रचना।
घोड़े की तरह ही अनेक हिंदी साहित्यकारों का खूंटा जहां सन 50-60 में गड़ा था, वहीं गड़ा है। दुनिया कहां से कहां आ गई? दुनिया का साहित्य कहां से कहां आ गया? मगर न बदले हम, तो न बदले। जितने बदले, ऊपर-ऊपर से बदले। यानी रूप बदल लिया, लेकिन मन न बदला। जातिवाद खुलकर बोल रहा है। धार्मिकता खुलकर खेल रही है, लेकिन साहित्य में न जाति बोलती दिखती है, न धर्म। यूं अंदर-अंदर जाति काम करती रहती है। लेकिन इससे क्या? हम नहीं बदलते।
वे आपको जैसा देखना चाहते हैं, वैसा पोज देते रहिए, तो आप ठीक हैं। वे खुद चुपके से बदल जाएं तो सही, लेकिन आप बदले तोे गलत। आप उनके लिए जस के तस बने रहिए। वे आपके खूंटे हैं।
हम शोले के असरानी हैं। असरानी का तकिया कलाम था- हम हैैं अंग्रेजों के जमाने के जेलर, हम नहीं बदलेंगे। अपना भी तकिया कलाम यही है कि ‘हम भी हैं अंग्रेजों के जमाने के लेखक, हम नहीं बदलेंगे’। ऐसा है मेरा खूंटा, जो सन पचास में जहां गड़ा था, वहीं अड़ा है और मैं जहां बंधा था, वहीं बंधा हूं। मुझे आजादी चाहिए, लेकिन अपने खूंटे से नहीं।

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  • Web Title:Tirchi Najar Hindustan column on 21 april