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आप हंसे सुख उपजे

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकार

कैसा मनहूस समय है कि एक मामूली से ‘मीम’ (कार्टून) को सिर्फ फॉरवर्ड करने के ‘अपराध’ पर न हंसने वालों ने जेल करा दी और अब माफी मंगवाई जा रही है।
इधर मैं हंसूं और उधर मेरे हंसने से कोई नाराज हो जाए कि मेरी इज्जत हतक की है, तब मेरा क्या होगा? इसीलिए अब मैं सिर्फ अपने पर हंसता हूं। बहुत हुआ, तो अपनी साहित्यकार बिरादरी पर हंसता हूं। वह अपनी है या कहूं कि वही अपनी है। उस पर हंसकर मैं अपने पर ही हंसता हूं।
जब ‘तिरछी नजर’ लिखने बैठता हूं, तो उन चेहरों को पहले याद करता हूं, जो मेरे हास्य के स्थाई आलंबन हैं। वे ही मुझे स्वस्थ रखते हैं। जैसे कि सबसे पहले मैं अशोक वाजपेयी का ध्यान करता हूं, क्योंकि वही हिंदी का एकमात्र हंसता हुआ नूरानी चेहरा  हैं। ‘काली जुल्फें’ तो अब नहीं बची हैं, लेकिन ‘रंग सुनहरा’ अब भी है। जब भी दिखते हैं, हंसते दिखते हैं। बोलते हैं, तो हंसते हुए दिखते हैं। मुझे लगता है कि कभी रोते होंगे, तब भी हंसते हुए दिखते होंगे। बाकी हिंदी साहित्यकारों के चेहरे तो ऐसे मनहूस हैं कि लाख कोंचो, तब भी नहीं हंस पाते, मानो सारी धरती का बोझ उठाए हों।
हिंदी के अधिकतर लेखक मुझे ‘टेंशन’ के ही नहीं, ‘हाइपर-टेंशन’ के शिकार लगते हैं। जब ‘अटेंशन’ नहीं मिलती, तो उन्हें ‘हाइपर-टेंशन’ हो जाता है। मैं जब उनके ‘टेंशन’ को ‘अटेंशन’ देता हूं, तो वह भले खुश न हों, उनके बीबी-बच्चे अवश्य खुश होते हैं कि चलो, हमारे पापा पर किसी ने तो ध्यान दिया। कई तो मेरी ‘खिंचाई’ से खुश होकर कहने लगते हैं कि सुधीश भाई ऐसे ही खींचते रहो, अच्छा लगता है। खिंचाई करना, मजाक करना, जोक मारना, मसखरी करना, उपहास उड़ाना वातावरण को हल्का करता है और मनुष्य को भी हल्का करता है।
हर अहंकारी अंदर से डरपोक होता है। कोई जरा-सी खिंचाई कर दे, तो केस कर देता है, ताकि उसका मजाक न उडे़, वह कमजोर न दिखे। अरे भैया, यह क्या कम है कि किसी ने आपको उपहास का पात्र समझा। मैं होऊं तो उसका शुक्रिया करूं कि आपने मुझ जैसे नालायक को भी अपनी खिंचाई के लायक समझा, वरना ‘पेड-पॉलिटिक्स’ के जमाने में कौन-किसको पूछता है। एक जमाना था कि जिसका कार्टून बनता था, वह खुश होता था। नेहरू को शंकर्स वीकली  वाले ने कार्टून बनाकर रगड़ा, तो नेहरू ने कहा कि मेरी खबर लेते रहना। मुझे हरगिज नहीं बख्शना। एक यह जमाना है कि किसी ने ‘मीम’ क्या फॉरवर्ड की कि आगबबूला हो गए। हंसना जनतंत्र को निरोगी बनाता है। न हंसना उसे रोगी बनाता है।
मुझे तो जब किसी दिन हंसने का आइडिया नहीं आता, तो मैं हिंदी साहित्य के हास्य-व्यंग्य के बड़े-बड़े उस्तादों को विजिट करने लगता हूं। मैं भारतेंदु हरिश्चंद्र के पास जाता हूं, बालकृष्ण भट्ट के पास जाता हूं, बालमुकुंद गुप्त से लेकर प्रताप नारायण मिश्र के पास जाता हूं। मैं कवि ‘गंग’ और ‘बेनी’ के पास जाता हूं। काका हाथरसी से लेकर गोपल प्रसाद व्यास, सुरेंद्र शर्मा से लेकर अशोक चक्रधर, कपिल शर्मा और राजू श्रीवास्तव तक ऐसे न जाने कितनों के पास जाता हूं और तब कहता हूं कि लाख मना करो, हम हंसने वाले हंसते ही रहेंगे। जो जितना मना करेगा, उस पर उतना ही हंसेंगे। फिर उनको देख सब हंसेंगे, जब सब हंसेंगे, तो आप किसे-किसे जेल करोगे/करोगी! 
कबीर के एक दोहे की यहां पैरोडी बना रहा हूं- ‘कबिरा आप हंसाइए, और हंसिए कोय।/ आप हंसे सुख उपजै, और हंसे दुख होय।’

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 19 may