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एक भूरि-भूरि कामना

सुधीर पचौरी

‘लिखना’ कठिन होता जा रहा है। ‘ऐसा’ लिखता हूं, तो सोचने लगता हूं, वह क्या सोचेंगे और ‘वैसा’ लिखता हूं, तो सोचने लगता हूं कि यह क्या सोचेंगे? डर लगता है कि जाने कौन किस शब्द का क्या मानी ले ले और धर ले कि अबे, यह क्या बकता है मेरे बारे में? ये क्या लिखे जा रहा है? क्या मैं इसी लायक हूं?
जिस लेखक पर लिखा, वही नाराज रहा। कइयों से तो ‘हलो-हाय’ तक बंद हो गई। मैंने की तारीफ, लेकिन मिला धन्यवाद की जगह धिक्कार। हमारा वही हाल हुआ, जो फिल्म प्यासा में गुरुदत्त का हुआ था- हमने तो जब कलियां मांगी, कांटों का हार मिला।
इसीलिए मेरा मानना है कि सिर्फ सत्ता तानाशाह नहीं होती, लेखक उसके भी बाप होते हैं। इनमें भी हिंदी के लेखक तो तानाशाहों के भी तानाशाह। एक बार आपने अपने लेख में सबका नाम लिया और उनको भूल गए, तो समझो कि आप गए। आपने उनकी तारीफ की और वह उनको कम लगी, तो आप उनके शाप के भागीदार हुए। जरा सी भी कमी कर दी, तो आप गए और अधिक कर दी, तो यह तो उनका हक था। कौन एहसान किया आपने?
इन दिनों लिखने से पहले लेखक का डर आकर खड़ा हो जाता है कि बेटे, यह क्या लिख रहा है? कुछ अपनी भी तो सोच? तूने ठीक-ठाक न लिखा, सही-सही न लिखा, तो फिर देख लेना। इन दिनों हिंदी के लेखकों पर लिखना उनके ‘ब्लैक मेल’ में लिखना है। आप लाख कहें कि लेखक आजाद है और उसे खतरा है तो सिर्फ सत्ता से, पर मुझे अधिक डर हिंदी लेखकों की ‘सुपर  सत्ता’ से है। जाने कौन किस शब्द का क्या मानी ले ले और मुझे धांय कर दे।
पुरखे तो बहुत पहले ही समझा गए थे कि सत्यं ब्रूयात् प्रियम् ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यम प्रियम्।  पर मेरे जैसे मूढ़मते को इसका असली मर्म अब जाकर समझ में आया है। ज्यों ही समझ में आया है, मैं ‘निंदा-युग’ से निकलकर ‘भूरि भूरि प्रशंसा के युग’ में आ गया हूं। इससे मेरी समीक्षा की दुकान अन्य समीक्षकों की दुकानों से आगे निकल गई है।
हर समय मेरी समीक्षा के ग्राहक जमे रहते हैं। सब चाहते हैं कि मैं उनकी नई कृति पर कुछ लिखूं, ताकि वे साहित्य के उच्चतम शिखर पर विराजमान हो जाएं। इसके लिए आजकल मैं समीक्षा लिखते वक्त साहित्य के ‘विशेषणों’ की एक डिक्शनरी रख लेता हूं और लेखक के नाम के आते ही पहले पांच-दस विशेषण लगा डालता हूं और नाम के बाद फिर पांच-दस।
जब से साहित्य के ‘प्रशंसा युग’ का मर्म समझ में आया है, तब से मेरी ‘पौ बारह’ हैं। इसके लिए आपको कोई जप-तप नहीं करना पड़ता। बस कुछ विशेषणों को चिपकाना आना चाहिए। जैसे- महान प्रतिभा के धनी, अद्वितीय प्रतिभा के स्वामी, विलक्षण प्रतिभा के पुरोधा, अद्भुत रचनात्मकता के दैदीप्यमान नक्षत्र, अनुकरणीय कला से संपन्न, अनूठी लेखनी के स्वामी, अनोखी प्रज्ञा के मालिक, अन्यतम प्रतिभा के आगार। ये कुछ विशेषण हैं, जिनका सही इस्तेमाल करने से हम सब भी ‘विलक्षण’ ‘अद्भुत’ ‘अनूठे’ ‘अनोखे, ‘अनुकरणीय’ हो उठते हैं। 
इन्हीं देव-दुर्लभ विशेषणों का उपयोग करने से साहित्य के ‘इहलोक’ और ‘परलोक’, दोनों संवर जाते हैं। इसलिए हमेशा एक-दूसरे की ‘भूरि-भूरि’ करें- आप मेरे ‘विलक्षण’। मैं आपका ‘विलक्षण’। आप मेरे ‘अद्भुत’। मैं आपका ‘अद्भुत’। आप मेरी ‘भूरि-भूरि’। मैं आपकी ‘भूरि-भूरि’। जिउं तो ‘भूरि-भूरि’ करता जिउं। और मरूं तो ‘भूरि-भूरि’ करता मरूं।
 

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 17 march