DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

लोदी गार्डन की कविता

तिरछी नजर

इतनी सारी कविताएं हैं, फिर भी न कोई नाम है, न पता, न पहचान। वे मेले में खोए हुए बच्चे की तरह हैं, जिन्हें अपना नाम तक नहीं मालूम। जिस समाज में हर चीज का ‘नामकरण’ किया जाता हो, हर बंदे का एक असली और दो-चार उपनाम होते हों, वहां कविता इस कदर ‘बेनामी’ बनी रहे कि कोई पुकार तक न सके कि यह फलां कविता है, यह ढिकां कविता है, यह बात कविता के भविष्य के लिए शुभ नहीं।
बिना नाम के भी क्या कोई जीवन होता है? न राशन कार्ड बनता है, न आधार और बिना आधार के कविता कैसे हो सकती है? न राशन, न पानी, न गैस, न मोबाइल, न कहीं दाखिला, न बैंक अकाउंट। बिना नाम, पते, आधार की कविता आखिर कब तक चलेगी?
जिस समाज में ‘यथा नाम तथा गुण’ की परंपरा हो, उस समाज में भी अगर कविता को कोई नाम न दिया जाए, तो यह अपने आप में एक अमंगलकारी बात है। अपना समाज नाम के बिना नहीं चलता। जब कोई नाम नहीं देता, तो लोग छोटू, मुन्नू, गोलू, मोटू, गोबर, घीसू और पलीता नाम तक रख देते हैं। 
लेकिन आज की कविता ‘बेनामी प्रॉपर्टी’ की तरह ‘बेनाम’ है। हजारों कवि हैं, लाखों कविताएं हैं, लेकिन नहीं है, तो उनका कोई नाम। हिंदी साहित्य के हजारों बरस पुराने इतिहास पर नजर डालें, तो आपको किसी युग की कविता ‘बेनामी’ नहीं मिलेगी। 
कई के तो दो-दो नाम मिलेंगे। जैसे आदि काव्य या वीरगाथा काव्य, भक्ति काव्य या मध्यकालीन काव्य, रीति काव्य या सेक्सुअलिटी का काव्य, आधुनिक काल या गद्य काल। इसके आगे, इतिवृत्तात्मक काव्य या सुधारवादी काव्य, छायावादी काव्य या रोमैंटिक काव्य, प्रगतिवादी काव्य या क्रांतिकारी काव्य, नई कविता या लघुमानववादी कविता, अकविता या साठोत्तरी कविता आदि-इत्यादि।
पचास साल गुजर गए, इस दरम्यान एक से एक कवि आए और निकल गए। ढेर सारे मौजूद भी हैं, जो न जाने कब से कविताएं लिख रहे हैं। इनाम-इकराम भी झटके हुए हैं, पर उनकी कविता को किस नाम से पुकारा जाए?  
वक्त आ गया है कि अब इस कविता का नामकरण कर दिया जाए। मेरी नजर में इसे ‘लुटियंस दिल्ली की कविता’ नाम बेखटके दिया जा सकता है। यह पसंद न हो, तो ‘आईआईसी की कविता’ कह सकते हैं।  यह भी फिट न लगे, तो इसे ‘लोदी गार्डन की कविता’ कह सकते हैं। ‘लोदी गार्डन की कविता’ कहते ही एक तो कविता ‘सेकुलर’ नजर आती है, दूसरे वह इतिहास से जुड़ जाती है, तीसरे ‘खान मार्केट’ से रिलेट हो जाती है, चौथे, मैक्समूलर मार्ग पर होने के कारण वह अंतरराष्ट्रीय छवि की हो जाती है और सीधे वेदों से जुड़ जाती है।
प्रकृति के इतने पास-छायादार द्रुमों के झरते पल्लव-बीच में ताल-ताल में कमल कमलिनी, प्रेमी युगल और इन्हें निहारता कवि-यहां पहुंचकर कविता को विश्राम मिलता है। श्रम-परिहार होता है। सेंट्रलाइज्ड एसी में बैठा कवि केपीचिनो कॉफी या चाइना टी विद गरम पकौड़ों का स्वाद लेते हुए अपनी कविता को उड़ान भरते देखता है। लोदी गार्र्डन से उड़कर उसकी कविता सीधे पेरिस, फ्रेंकफर्त, हॉर्वर्ड या येल स्कूल के कैंपस में उतर रही है और गायत्री चक्रवर्ती उसका डिकंस्ट्रक्टिव पाठ कर रही हैं। 
मेरा सुझाव है कि वर्ष में एक दिन दिल्ली के सभी कवि लोदी गार्डन में काव्य-पाठ करें और फिर इस नाम का चमत्कार देखें। एक बार फिर कविता की वापसी हो जाएगी।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 17 june