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हिंदी साहित्य- दो सौ रुपये किलो

सुधीर पचौरी

दरियागंज की जय हो और उसके साथ ही जय हो इस कॉलम के एक परमानेंट पाठक की। उन्होंने संडे को दरियागंज विजिट किया, तो हिंदी साहित्य को दो सौ रुपये के रेट पर बिकता पाया और तुरंत हमें उसका फोटो वाट्स एप्प से भेज दिया। क्या गजब का फोटो है? एक स्टूल पर किताबें लगी हैं, जिनके ऊपर एक पोस्टर लगा है- हिंदी साहित्य: दो सौ रुपए केजी।
एक से एक महान लेखकों की पुस्तकें लगी हैं। प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियां, शरतचंद्र के यादगार उपन्यास, गोर्की का उपन्यास मां  और मेरे विश्वविद्यालय, कौटिल्यकालीन समाज, हितापेदेश, बाबा साहब आंबेडकर, रविदास, हॉरर स्टोरीज, आई लव यू - जब ऐसे दुर्लभ नमूने पटरी पर हैं, तो गोदाम में क्या-क्या न होंगे? इसे कहते हैं- जनता से साहित्य को जोड़ना और जनता का साहित्य से जुड़ना। इस एक पोस्टर ने हिंदी साहित्य की न जाने कितनी समस्याएं सुलझा दीं। 
साहित्य बिकता नहीं। साहित्य के पाठक नहीं हैं। उसे कोई पढ़ता नहीं है।- एक ओर तो हिंदी में यह निराशावादी राग बजता रहता है, दूसरी और यह दो सौ रुपये किलो बेचने वाला कहता है कि साहित्य के खरीदार हैं और तोल-तोलकर ले जाते हैं। मन किया कि इस दो सौ रुपये किलो बेचने वाले को हिंदी साहित्य के ‘सेवक शिरोमणि’ की उपाधि से विभूषित करूं। 
शनिवार-रविवार की सुबह आपके मुहल्ले में कोई रद्दीवाला आवाज लगाता है, तो समझ लीजिए कि यह रद्दीवाला नहीं, हिंदी साहित्य का ‘रखवाला’ है, जो आपके साहित्य को जनता से जोड़ने वाला है। आपसे दस रुपये किलो खरीदेगा और दरियागंज में दो सौ रुपये किलो बेचेगा। उसके उपकार देखिए। आप परेशान थे कि किताबों को कहां रखें? वह आया और दस रुपये किलो के भाव से ले गया। उनका वर्गीकरण किया और दरियागंज की पटरी पर सजा दिया। जिसे आप भार सदृश समझते। हर बार सोचते थे कि ये जाए, तो घर में कुछ जगह बने। वह उनको ले जाता है और नए पाठकों की तलाश में दरियागंज की पटरी पर एक रेट फिक्स करके लगा देता है।
दरियागंज का हिंदी साहित्य से डबल संबंध है। हिंदी साहित्य के समस्त सोलह संस्कार दरियागंज में ही हुआ करते हैं। पुंसवन से लेकर नामकरण, दामकरण, प्रकाशन आदि जितने पुस्तक-संस्कार हैं, सब दरियागंज में संपन्न होते हैं। जब पुस्तकें घर की जगह घेर लेती हैं, तोे उनका ‘रद्दी संस्कार’, ‘तोल संस्कार’, ‘रेट संस्कार’ से लेकर ‘बोरी संस्कार’ तक होते हैं, और अंतत: आपकी किताब दरियागंज की पटरी पर किसी दरियादिल को दो सौ रुपये किलो में मिल जाती है। 
यानी जो कुछ था सोई भया, अब कछू कहा न जाय। पहले प्रकाशन ने संस्कार किए, फिर इस दरियागंज वाले भैये ने किया। यही तो है पुस्तक की अमरता। जिस तरह आत्मा न जायते म्रियते वा कदाचित् कही जाती है, उसी तरह पुस्तक अमर होती है। मुझे तो लगता है कि दरियागंज न होता, तो हिंदी साहित्य न होता। 
आज जब अंग्रेजी बेस्ट सेलर तुलकर बिकते हैं, हिंदी के भला क्यों नहीं बिक सकते? आज हिंदी साहित्य अंग्रेजी साहित्य से कम  नहीं। इसे देखकर मैं तो यह सोच रहा हूं कि अपनी कुछ किताबें भी दो सौ रुपये किलो वाले चट्टे में रखवा दूं, ताकि कल को जब कोई अमेरिकी रिसर्चर आए, तो उसे मालूम पडे़ कि इन दिनों का असली बेस्ट सेलर तो यह लेखक था, जिसकी किताबें दो सौ रुपये किलो में मिला करती थी।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 17 february