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जो होता है, थोक में होता है

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकार

हिंदी वाले प्रतिभा के धनी हैं। कहीं से कोई एक आइडिया हाथ लगे, फिर देखिए कि वे कैसे-कैसे गजब ढाते हैं। इतना घिसेंगे कि वह भूल जाएगा कि वह कभी आइडिया था। एक बार अपने गुप्तजी ने हिंदी वालों को गलती से नसीहत दे दी- हो रहा है जो जहां सो हो रहा/ यदि वही हमने कहा तो क्या कहा? / किंतु होना चाहिए कब क्या कहां/ व्यक्त करती है कला ही यह यहां!
हिंदी वालों ने इस पर आंख मूंदकर अमल किया। पहले सबने ‘हो रहा है, जो जहां सो हो रहा’ किया। फिर ‘किंतु होना चाहिए कब क्या कहां?’ इस तरह हिंदी वाले पहले ‘यथार्थवादी’ हुए, फिर जब ‘आदर्शवाद’ की आंधी चली, तो सब आदर्शवादी हो गए। जब इन दोनों अतियों के बीच की लाइन ली, तो सब ‘आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी’ हो गए।
हिंदी में जो होता है, थोक के भाव होता है। सब सभी को मौलिक मानते हैं और सब सबकी नकल कर असल होने का दावा करते हैं। हिंदी न अपने लेखक को कष्ट देती है, न पाठक को कष्ट देती है। हिंदी का मंत्र है- अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम...।  कौन मौलिकता के फेर में पड़े! जब इतना सब पहले से है, तो उसे अपना बनाओ। यह मेहनत क्या कम है?
हिंदी इसी नियम से चलती है। जब ‘छायावाद’ चला, तो हर्र ंहदी साहित्यकार  छायावादी हो गया। किसकी छाया में है? छतरीवाली छाया है कि पेड़ की छाया है कि दीवार की छाया है कि बादल की छाया है? ऐसे बारीक सवाल न किसी ने पूछे, न जवाब मिला। सब छाया-छाया खेलते रहे।  
फिर प्रगतिशीलता की लहर आई, तो सभी ‘प्रगतिशील’ होने लगे। प्रगति के आगे ‘शील’ कुछ प्रतिक्रियावादी लगा, तो ‘शील’ हटाकर ‘वाद’ जोड़ दिया गया और इस तरह सब ‘प्रगतिवादी’ कहलाने लगे। यहां कोई अपने को माक्र्स का अवतार समझता, कोई लेनिन का। कोई-कोई तो अपने को पूरा स्टालिन समझता और सबको ठिकाने लगाने लगता। लेकिन प्रगतिवादी में ‘प्रगति’ का मतलब क्या है? यह गति का पर्याय है कि परम गति का, यह न किसी ने पूछा न किसी ने समझाया!
इसी बीच अज्ञेय ने प्रतीक निकाला, तो उसमें छपने वाला हर लेखक प्रतीकवादी कहलाने लगा। लोग प्रतीकवादियों की तरह लिखने लगे। वे अज्ञेय की तरह स्मिति देते। दाढ़ी बढ़ाते और उनकी तरह ही बहुत कम बोला करते। यह भी थोक में हुआ। 
जब लोग इन दोनों की लट्ठ-पिटाई से तंग आ गए, तो एक ‘नया’ विशेषण ढूंढ़ लाए। सब ‘नई कविता’ और ‘नई कहानी’ लिखने लगे। ‘नए कवि’और ‘नए कथाकार’ होने लगे। यहां तक कि ‘नए आलोचक’ तक होने लगे। इतना ‘नया-नया’ हुआ कि पुराना बचा ही नहीं। लेखक गांव-कस्बे से निकल दिल्ली, मुंबई, कोलकाता आते, तो सब ‘नया-नया’ ही लगता और वे नए कवि, नए कथाकार हो जाते। 
इसके बाद ‘एंटी -पोयटों’ ने जन्म लिया। अंग्रेजी के ‘एंटी पोयट’ हिंदी में आकर ‘अ-कवि’ कहलाने लगे। जिधर देखो, उधर ‘अ-कविता’ ‘अ-कहानी’ की बहार आ गई। बस एक कसर रह गई। आलोचक की जगह ‘अ-आलोचक’ न हो सके। उच्चारण कैसे करते? फिर जब ‘प्रतिबद्धता’ की लहर आई, तो सब ‘प्रतिबद्ध’ होने लगे। जादुई यथार्थवाद आया, तो सब मारकेस, बोरखेस की नकल मारने में जुट गए। यह भेड़ियाधसान अब तक जारी है।
इसीलिए कहा कि हमारी हिंदी में जो भी होता है, वह थोक में होता है।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 16 december