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हिंदी लेखक के सरोकार

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकार

इन दिनों हिंदी में सबसे ज्यादा चलने वाला शब्द है ‘सरोकार’। पिछले 30-40 साल से यह धड़ल्ले से चल रहा है। कवि के सरोकार, कथाकार के सरोकार, आलोचक के सरोकार, इनके सरोकार, उनके सरोकार। ऐसे वाक्यांश आए दिन दिखाई-सुनाई देते हैं।

एक विद्वान ने बताया कि ‘सरोकार’ शब्द जरूर ही बांग्ला से आया है। बांग्ला में ‘ओ’ की बड़ी महिमा है। हर शब्द में ‘ओ’ लगता है। ‘सरकार’ को किसी ने ‘सोरोकार’ बोल दिया होगा, जो घिसकर अपभ्रंश बनकर हिंदी में आकर ‘सरोकार’ हो गया। दूसरे विद्वान ने कुछ सोचकर बताया- हो सकता है कि सरोकार अंग्रेजी के ‘सरोगेट’ से आया हो। ‘सरोगेट’ से ‘सरो’ लेकर सरकार की कार में बैठ हिंदी में दौड़ लिया। मुझे तो लगता है कि सरोकार और सरकार में जेनेटिक किस्म का रिश्ता है। इसकी व्युत्पत्ति में सरकार का हाथ है। हिंदी साहित्य हमेशा से सरकार से टकराता आया है। कभी अंग्रेजों से टकराया, फिर देसी सरकारों से टकराया और आज भी टकराता रहता है। इसी टक्कर के चक्कर में उच्चारण दोष हो गया। सरकार को ‘सरोकार’ कहने लगा। 
इसके बाद एक तीसरे विद्वान ने बताया कि इसकी जड़ कवि के स्वभाव में है। हिंदी कवि का स्वभाव हमेशा दुखी रहना है। वह संसार के दुख से दुखी रहा है। वह जानता है कि संसार में ‘दुख’ यानी ‘सोरो’ प्रदूषण की तरह फैला रहता है। यही ‘सोरो’ जब कार में बैठा, तो ‘सरोकार’ हो गया।  लेकिन यह व्युत्पत्ति भी कुछ जमी नहीं। शब्द-क्रीड़ा भी हो, तो कुछ काम की तो हो।
जब से हिंदी में शब्दों की व्युत्पत्ति खोजने और शब्दों की यात्रा बताने का काम बंद हुआ है, तब से मुझे न जाने क्यों लगने लगा है कि यह जिम्मेदारी हिंदी मुझे देने वाली है, इसीलिए जब-तब शब्दों की व्युत्पत्ति के बारे में सोचने लगता हूं। काश, आज किशोरीदास वाजपेई या विद्यानिवास मिश्र या त्रिलोचन होते, तो उनके चरण रूपी कमलों में बैठ मैं शब्दों का संधान करता रहता और पंडित की पदवी पाता। 
शब्द की व्युत्पत्ति इसी तरह से की जाती है, वरना शब्दकोशीय प्राणी बड़ा ही खड़ूस होता है। वह एक-एक शब्द की ऐसी-ऐसी व्युत्पत्ति बताता है कि आदमी चकराने लगता है, यह धातु जमा, यह प्रत्यय जमा, यह उपसर्ग बराबर। फिर बताने लगेगा कि महाभारत  के अमुक पर्व में तमुक श्लोक में यहां पर आया है यह शब्द।
शब्द की व्युत्पत्ति खेल-खेल में भी की जाती है और इसे आम जनता नित्य किया करती है। और, कोई जरूरी तो नहीं कि हर शब्द का एक निश्चित अर्थ हो ही। चलिए, यही बताइए कि सरोकार के बड़े भाई शब्द ‘प्रतिबद्धता’ का क्या मतलब था?
लाख सिर मार लो, लाख कोश देख लो, लाख बहस कर लो, सरोकार की तरह प्रतिबद्धता का भी ठीक-ठीक अर्थ मालूम नहीं पड़ता, जबकि हिंदी में एक से एक बड़े प्रतिबद्ध लेखक हो गए। ऐसे-ऐसे कट्टर प्रतिबद्ध हुए कि जिस खूंटे से प्रतिबद्ध थे, यानी बंधे थे, आज तक बिना हिले वहीं खड़े हैं।  
एक वक्त ‘प्रतिबद्ध’ शब्द की भी वैसी ही बहार थी, जैसी आजकल ‘सरोकार’ की है, लेकिन आज तक किसी ने साफ नहीं किया कि प्रतिबद्ध का मतलब अगर बंधना है, तो यह बताओ कि किस खूंटे से बंधे रहे? हमारे एक उर्दू के विद्वान मित्र ने बताया कि अंग्रेजी में जिसे ‘कंसर्न’ यानी फिक्रमंद कहते हैं, उर्दू में उसी को सरोकार कहते हैं। लीजिए, कहां का खूंटा और कहां जा के उखड़ा।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 15 july