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उम्र के मामले र्में हिंदी उदार है

हिंदी किसी को बूढ़ा नहीं होने देती। हिंदी में सभी रचनाकार युवा हैं। हिंदी में हर लेखक चिर युवा कहलाता है और आलोचक भी हर लेखक को युवा लेखक के नाम से पुकारते हैं। कारण है ‘केश कलर कल्चर’। ये ‘हेअर कलर’ तो अब चले हैं, जिनकी कृपा से अस्सी-नब्बे बरस का लेखक भी जवान नजर आता है, लेकिन हिंदी ने तो अपना लख-लखा न जाने कब से खोज रखा है। आज तक एक लेखक को भी बूढ़ा या वृद्ध या बुजुर्गवार नहीं कहा गया। युवा हिंदी सबको युवा न कहे, तो क्या बूढ़ा कहे?
उम्र के मामले में हिंदी एकदम उदार है। वह किसी की उम्र नहीं पूछती। कौन कितने बरस का है, यह पूछना तुच्छ जीवों यथा रिसर्च स्कॉलरों का काम है। क्या कोई बता सकता है कि जब कालिदास ने अभिज्ञान शाकुंतलम्  की रचना की, तो कितनी उम्र के थे? हिंदी में तो लेखक का मतलब ही ‘युवा’ होता है। हिंदी में 20-25 साल का युवा तो युवा होता ही है, 50-60 साल वाला भी युवा कहलाता है और आजकल तो 80 वाले भी युवा कहलाते हैं। इसीलिए हिंदी में किसी को बूढ़ा, वृद्ध या बुजुर्ग कवि-कथाकार नहीं कहा जाता। और आलोचक तो स्वभावत: ‘जवान’ होता है। उससे सभी डरते हैं।
जबसे अमिताभ बच्चन ने बूढ़ा होगा तेरा बाप  में बूढ़ा कहने पर लोगों को कूटा है, तब से तो बूढ़ा शब्द हिंदी के शब्दकोश से ही बाहर हो गया है। यूं ‘बूढ़े’ से कुछ सुथरा शब्द ‘वृद्ध’ है, जो उतना अशालीन नहीं दिखता, जितना बूढ़ा दिखता है, लेकिन हिंदी में इसे कहना भी शालीनता के विपरीत ही माना जाता है।
इन दिनों तो अपने ‘केश कर्तन कलाकार’ जिस-तिस को जवान बनाने पर तुले रहते हैं। पता नहीं, उनको सफेदी से ऐसी चिढ़ क्यों है कि जिसके भी सफेद देखते हैं, उसी के काले कर देते हैं। यह रहस्य मेरी समझ में कुछ देर से ही आया कि ‘केश कर्तन कलाकारों’ ने सबको युवा क्यों बनाया होगा? इसलिए कि वे भी एक कलाकार हैं। रचनाकार हैं। साहित्यकार हैं।
जरा सोचिए, खोपड़ी दूसरे की और बाल भी दूसरे के, लेकिन कैंची-कंघा अपना और भइए ने तो देखते-देखते उलझों को सुलझा दिया और सुलझाकर फिर से उलझा दिया और फिर किसी पक्के ‘रूपवादी’ की तरह केशों की ‘कंडीशनिंग’ कर दी। उनको एक ‘स्ट्रक्चर’ में ढाल दिया और आप हो गए शाहरुख खान, विराट कोहली और सैफ अली। ये वो जादूगर हैं, जो क्षण में अस्सी वाले को भी बीस का कर देते हैं। हमारे जैसे कुछ ‘श्वेत-केशी’ टाइप को बाहर कर दें, तो बाकी सब इनकी कृपा से चिर-युवा मिलेंगे और रफी की आवाज में गाते मिलेंगे, जवानियां ये मस्त-मस्त बिन पिए...। 
इन दिनों तो ‘केश कर्तन कलाकार’ आपके कान में यह तक कह देते हैं कि आप कहें, तो आपको फिफ्टी-फिफ्टी कर दूं। मैंने पूछा, फिफ्टी-फिफ्टी से मतलब? वह बोला, एक ऐसा ‘हेअर डाई’ आया है कि जो हर बाल को काला नहीं करता। किसी कलाकार की तरह कुछ को छोड़ कुछ को करता है। इससे कुछ काले कुछ सफेद नजर आते हैं, यानी ‘ब्यूटी’ की तरह ‘हाफ रिवील्ड हाफ कंसील्ड’। सफेद काले का संतुलित मिश्रण।
हठात् मुझे उस शाम ‘केश कर्तन कलाकार’ की दुकान पर बैठे अपने ‘सौंदर्यशास्त्री’ का पता चला, जिसका नाम कालीचरण था। पता नहीं क्यों, लोग अब भी क्रोचे को ‘सौंदर्यशास्त्र’ का जनक मानते हैं, जबकि अपने हर गली-कूचे में एक से एक ‘क्रोचे’ रहते हैं, जो अज्ञेय और अशोक वाजपेयी से भी बड़े ‘सौंदर्यवादी’ और ‘रूपवादी’ हैं।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 14 july