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समीक्षा की समीक्षा

सुधीर पचौरी

‘वे उन गिने-चुने कवियों में से हैं, जो आज के जीवन के बहुत से अनकहे अनुभवों को अद्भुत सादगी से कह सकते हैं।’ यह एक काव्य संकलन की एक ‘समीक्षा’ से लिया गया एक वाक्य है। अब जरा इस वाक्य के अंदर विचरण करिए- ‘उन गिने-चुने’ से समीक्षक कह रहा है कि जिस ‘कवि’ के बारे में कहा जा रहा है, वह ‘अकेला’ नहीं है, यानी उस जैसे अनेक हैं। यहां, समीक्षक ‘उन गिने-चुने’ के बारे में सिर्फ संकेत करके छोड़ दे रहा है, ताकि आप समझें कि समीक्षक बहुत पढ़ा-लिखा है कि ‘उन गिने-चुनों’ के बारे में खूब जानता है।
हिंदी की समीक्षाओं में इन दिनों ऐसे ही ‘उन गिने-चुने’ कवियों या कथाकारों की ‘टेक’ ली जाती है। इसे आप आज की समीक्षा का ‘मंगलाचरण’ कह सकते हैं। जिस तरह जादूगर हाथ की सफाई से रूमाल को कबूतर में बदल देता है, उसी तरह आज के बहुत से समीक्षक ‘भाषा की सफाई’ से ‘उन गिने-चुने’ में से एक को ‘बहुत कुछ’ सिद्ध कर देते हैं। मजा यह कि पूरी समीक्षा में समीक्षक ने ‘उन गिने-चुनों’ में से न किसी का नाम बताया है, न उनकी कोई विशेषता बताई। अब ‘समझदार’ के लिए इतना इशारा काफी है। यूं भी आपके समझने-न समझने से क्या फर्क पड़ता है? कवि की समझ में आ जाए और आशीर्वाद देने वालों की समझ में आ जाए, इतना काफी है।
वाक्य आगे कहता है कि समीक्ष्य कवि ‘बहुत से अनकहे अनुभवों को अद्भुत सादगी’ से कह सकता है। यहां समीक्षक दो बातों पर जोर दे रहा है- एक तो यह कि जिस कवि की समीक्षा की जा रही है वह कवि हमेशा ‘अनकहे अनुभवों’ को कहता है। मानो, बाकी ‘कहे हुए अनुभवों’ को कहते हों। अब आप खोजते रहिए ‘अनकहे अनुभवों’ को। इसके लिए पहले आपको ‘कहे गए’ अनुभवों की लिस्ट बनानी होगी। उसके बाद ही पता लगेगा कि ये ‘अनकहे’ हैं कि नहीं।
एक पाठक के रूप में आप इतनी माथा-पच्ची क्यों करेंगे? जो कहा जा रहा है, आप उसे चुपके से मान लेंगे और सोचेंगे कि समीक्षक ने जब ‘अनकहा’ कहा है, तो उसने जरूर अब तक ‘कहे गए’ अनुभवों की जांच-परख कर ली होगी। यानी यह ‘अनकहा’ भी उसी गोल-मटोल टाइप भाषा यानी ‘संधा भाषा’ में कहा जा रहा है, जिस भाषा का नायाब नमूना ‘उन गिने-चुने’ जैसा विशेषण बना था। अब जरा ‘अद्भुत सादगी’ पर आइए। ‘सादगी’ यानी बिना किसी साज-सज्जा के, यानी बिना किसी अलंकार के कहना अर्थात यह कविता सादी भी है और इसी कारण अद्भुत भी है। सादगी ही इसका अलंकार है। यह है ‘नव्य क्रांतिकारिता’ की एक बानगी। कविता न हुई खादी का कुरता हो गई। 
इसे कहते हैं आज की ‘समीक्षा’। न एक उदाहरण दिया, न एक नाम दिया, लेकिन बिठा दिया किसी अदने को बडे़ कवि के पीढे़ पर। साहित्यिक पत्रिकाओं में ऐसी पदावली में लिखी समीक्षाएं खूब नजर आती हैं- न कोई परख, न परीक्षा। समीक्षक कह सकते हैं कि दैनिक अखबारों में अधिक स्पेस नहीं होता, लेकिन लघु पत्रिकाओं में तो स्पेस ही स्पेस होता है। वहां भी समीक्षा क्यों? लगता है कि हिंदी समीक्षा का एक ‘फॉर्म’ छपवा लिया गया है, जो सर्वसुलभ है। अगर किसी को किसी काव्य-संग्रह की समीक्षा करनी है, तो उसे सिर्फ उस फॉर्म में कवि का और उसके संकलन का नाम भरना है, बाकी तो ऐसे अनमोल महावाक्य हैं ही।
जिस तरह ‘कविता’ और ‘कविता’ में भेद नजर नहीं आता, उसी तरह ‘समीक्षा’ और ‘समीक्षा’ में भी कोई फर्क नहीं नजर आता।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 14 april