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साहित्य में ‘वन टू का फोर’

सुधीर पचौरी

साहित्य का चौकीदार हूं। जब-जब साहित्य पर संकट आया, चेताता रहा हूं कि यह संकट आ रहा है, वह आ रहा। आज अगर साहित्य जिंदा है, तो मेरे जैसे सिक्योरिटी गार्डों की वजह से। इसीलिए एक बार फिर से चेता रहा हूं।
यह न ‘रूप’ का संकट है, न ‘अंतर्वस्तु’ का। न विचारधारा का संकट है, न कमिटमेंट का। न अभिव्यक्ति की आजादी का संकट है, न निरंकुशता का। हिंदी साहित्य के पास सब कुछ है- रूप ही रूप, अंतर्वस्तु ही अंतर्वस्तु, विचारधारा ही विचारधारा, कमिटमेंट ही कमिटमेंट। संकट है, तो ‘श्रोता’ के न होने है। पाठक न होने का संकट है। 
यह संकट साक्षात तब दिखा, जब हिंदी साहित्य के एक परमानेंट टाइप आयोजक ने मुझे गोष्ठी में बुलाते हुए कहा कि सरजी, आपको अवश्य आना है, बस एक रिक्वेस्ट है कि खाली हाथ न आएं, दो-चार श्रोता साथ लाएं। अकेले आना मना है। हमारी मजबूरी समझें। आप आएं, संग में चार लाएं। मैंने पूछा : श्रोताओं का क्या हुआ? आप तो अच्छी-खासी भीड़ जुटाने के लिए विख्यात हैं। आपके श्रोता तो कभी किसी को हूट भी नहीं करते। उनको क्या हुआ? वह बोले- हमारे श्रोता पता नहीं कहां गायब हो गए हैं। लाख बुलाओ, एक नहीं आता। हम मैसेज करते हैं, फोन तक करते हैं कि आइए। बढ़िया चाय-नाश्ते की दावत का लालच भी देते हैं। लेकिन इन दिनों एक नहीं झांकता।
मैंने पूछा- आखिर हुआ क्या? वह बोले- कुछ न पूछिए। सब साले लेखक हो गए हैं। कहते हैं कि अब हम श्रोता नहीं रहे। किसी और को सुनने क्यों आएं? हम क्या किसी साले लेखक से कम हैं? बहुत झेल लिए इनको-उनको, अब नहीं झेला जाता। बुलाना है, तो हमें लेखक की तरह बुलाओ और झेलो। मैंने कहा- ये तो अच्छी बात नहीं। अब साहित्य का क्या होगा? कौन सुनेगा साहित्यकारों को? 
आयोजक बोले, यही सोच सोचकर मैं भी परेशान हूं- पता नहीं, कौन सी व्याधि लग गई? यह कौन सी बीमारी है कि सारे के सारे एक ही दिन में लेखक बन गए। लगता है, हम जैसे साहित्य सेवक एक दिन बेरोजगार हो जाएंगे।
मैंने चिंतातुर होकर कहा- यह तो बड़ा ही अघट सा घट रहा है। एकदम पातक हो रहा है। हर श्रोता लेखक हो जाएगा, तो फिर लेखकों को सुनेगा कौन?
‘यही तो’ वह बोले, ‘लेखक थोक में नहीं हुआ करते। अगर सब लेखक हो गए, तो सुनने वाले कहां से आएंगे? यही सबसे बड़ा संकट है। इसीलिए आपसे कह रहे हैं कि आप आएं, तो अपने संग में दो-चार श्रोता अवश्य लेकर आएं, तभी हॉल भरेगा’।
आयोजक महोदय बोलते जा रहे थे : ‘याद करिए, जब फलां जी आते थे, तो अपनी गाड़ी में तीन-चार श्रोता अपने संग लेकर आते थे। और फलां जी तो अपने चेले रूपी श्रोताओं को झुंड में लेकर चलते थे। पांच आगे, पांच पीछे, पांच दाएं, पांच बाएं, बीस तो संग रहते ही थे। उनका साहित्य अपने श्रोताओं का कालांतर में कल्याण करता था। समय आने पर सभी यथायोग्य प्राप्त करते थे और फलां विवि के आचार्यजी की तो पूछो ही नहीं,  उनके साथ पूरी क्लास एडवांस में मंडी हाउस तक चला करती थी। उनके साथ आते और उनके बोलते ही उठ जाते, वे अकेले ही ‘वन टू के फिफ्टी’ बराबर थे। जितने श्रोता उन्होंने गोष्ठियों को दिए, किसी ने न दिए। उनके लिए बस भरकर आती थी।’
साहित्य में कुछ करना है, तो आप भी अपने श्रोता लेकर आइए। आप भी ‘वन टू का फोर’ करते हुए आइए, वरना न आइए।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 13 january