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सीधे यथार्थ से मुठभेड़

सुधीर पचौरी

हिंदी का हर लेखक यथार्थ से जुड़ा होता है। वह जब भी देखता है, यथार्थ देखता है। जब दिखाता है, यथार्थ ही दिखाता है। जो कहता है, यथार्थ कहता है। हिंदी में सभी ‘यथार्थवादी’ हैं। कोई यथार्थ का ‘चित्रण’ करता है। कोई उसका ‘वर्णन’ करता है। कोई उसको ‘व्यक्त’ या ‘अभिव्यक्त’ करता है। हिंदी के सभी लेखक यथार्थ को ‘पकड़े’ रहते हैं।
यथार्थवाद भी कई तरह का होता है। कोई ‘गहन’ यथार्थवादी होता है, तो कोई ‘ठोस’ यथार्थवादी। ‘सतही यथार्थवादी’ कोई नहीं होता। वर्तमान अर्थ में ‘यथार्थ’ शब्द सबसे पहले किसने चलाया, यह पता करना मुश्किल है, लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि ‘यथार्थ’ अंग्रेजी के ‘रीयल’ का हिंदी अनुवाद बनकर आया। ‘रीयल’ आया, तो ‘रीयलिज्म’ कहां जाता? वह ‘यथार्थवाद’ बनकर हिंदी में जम गया। तबसे वही ‘मानक’ हो गया। जो  यथार्थवादी होता, वही ‘महान’ होता है। जो  कल्पनाबाज होता, ‘तुच्छ’ कहलाता है।
मानकर चला जाता कि यथार्थ हमेशा रचना के बाहर होता है। लेखक उसे कान से पकड़कर उठाता है और रचना में डाल देता है, और इस तरह ‘यथार्थवादी’ हो जाता है। शुरू में हिंदी लेखक यथार्थ को सिर्फ ‘पकड़ा’ करता था। फिर पता नहीं क्या हुआ कि वह यथार्थ से सीधे ‘टकराने’ लगा। जब टकराने से भी मन नहीं भरा, तो वह यथार्थ से सीधे ‘मुठभेड़’ करने लगा। 
यानी लेखक तीन रूपों में नजर आया। यथार्थ को ‘पकड़ने’ वाला, उससे ‘टकराने’ वाला और ‘मुठभेड़’करने वाला। समीक्षक यह तो बताते हैं कि अमुक लेखक यथार्थ पकड़े हुए है, लेकिन कैसे पकडे़ है? कितना पकड़ में आया? कितना छूट गया? यह न कोई समीक्षक बताता, न लेखक। फिर यथार्थ से ‘टकराने’ वाले आए। नई कहानी वाले यथार्थ से टकराते बताए जाते रहे और उनके बाद वाले सीधे यथार्थ से मुठभेड़ करते बताए जाते रहे। हमारे जैसे जिज्ञासु हिंदी लेखकों की इस पकड़ाई और टकराई के पराक्रम पर चकित होते और सोचते कि जब अपना लेखक यथार्थ से टकराया होगा, तो बेचारे यथार्थ का क्या बना होगा?
टक्कर एकतरफा नहीं होती। जो टकराता है और जिससे टकराता है, दोनों क्षतिग्रस्त हुआ करते हैं। यानी यथार्थ और लेखक, दोनों चोटिल होते होंगे। दोनों ही किसी अस्पताल में भर्ती होते होंगे। लेकिन जब यह लेखक यथार्थ से ताजा-ताजा टकराए एक लेखक को देखने गया, तो वह घर में मुस्कराता मिला। उसे इस टकराने की एवज में अकादेमी जो मिलने वाला था। ऐसे ही, जब मुठभेड़ करने वाले वीर बहादुर को देखने गया, तो मालूम हुआ कि उसको अमेरिका वाले ‘फैलो’ के रूप में बुला रहे हैं। 
बाद में लातीनी दुनिया से एक ‘जादुई यथार्थवाद’ आया, जिसकी नकल कर एकाध हिंदी वाला ‘अकादमी’ हो गया और फिर उसका भी ‘द एंड’ हो गया। यथार्थवाद के अवसान के बाद, ‘उत्तर संरचनावादी’ कहने लगे हैं कि यथार्थ ‘भाषा के बाहर’ न होकर भीतर होता है, और अगर कुछ होता भी है, तो सबका ‘अपना-अपना सच’ होता है। कुछ तो यह तक कहने लगे हैं कि यथार्थ क्या है? सच क्या है? कोई नहीं जानता।
अपने यहां तो ऐसी सोच के लिए बहुत पहले कह दिया गया- ‘नेति नेति’। जो ‘यथार्थ’ या ‘सत्य’ बड़े-बड़ों के लिए ‘नेति-नेति’ रहा,  उसी के कान पकड़कर अपने हिंदी वाले उससे  उठक-बैठक कराया करते हैं। 
शायद इन्हीं को देखकर एक सीरियल वाली भौजी कहती हैं- ‘सही पकडे़ हैं!’

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  • Web Title:tirchi najar Hindustan column on 12 may