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4 अप्रैल, 2020|9:03|IST

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वह जलता है तो जलने दे

पता नहीं क्यों, कुछ लोगों ने ईष्र्या-द्वेष को नकारात्मक भाव सिद्ध कर उनको रचनात्मक जगत से खारिज कर रखा है? हमारे लेखे तो इनसे अधिक रचनात्मक भाव कोई और नहीं। यकीन न हो, तो इनकी रचनात्मक क्षमता को पुस्तक मेले में आकर देखें।
किसी की लिखी एक पुस्तक मेले में आई है और किसी की तीन आई हैं, तो आपको एक वाले के अंदर से ये धुआं सा कहां से उठता है वाला मीर का शेर बजता सुनाई देगा। अगर किसी की दो किताबें आई हैं और दूसरे की पांच, तो दो वाले को हाइपरटेंशन हो जाएगा। हमारा शोध यही बताता है कि जिसने एक न लिखी, जिसकी एक न आई, वह दूसरों की आई से इस कदर धधकने लगता है कि फायर ब्रिगेड बुलाने के हालात बन जाते हैं। इसी वजह से जनवरी की घोर ठंड के इन दिनों में भी मेले के हॉलों में गरमी लगती है, क्योंकि अंदर तरह-तरह के लेखक धुंधुंआते नजर आते हैं।
यही लेखक और लेखन के बीच के ‘आत्मसंघर्ष’ के असली क्षण होते हैं। इसी को विचारधारात्मक संघर्ष कहते हैं। लेखन के संघर्ष से कहीं बड़ा होता है छपने का संघर्ष। लिख कोई भी लेता है। आप चाहें, तो फेसबुक पर पेज दर पेज भर सकते हैं, पर जो सुख सुंदर से कवर में पक्की जिल्द बंधी किताब के दर्शन में मिलता है, वह साइबर स्पेसी लेखन में कहां? 
बड़ी मुश्किल से एक टटका शीर्षक चुना। नामी डिजाइनर से कवर बनवाया। वही पुण्यभागा पुस्तक मेले के इस पुण्य अवसर पर बढ़िया से कागज पर छपकर अभी-अभी आई है। लाल पारदर्शी पेपर या रेशमी कपड़े में बंद वह कैसी तो लग रही है? लोकार्पक पैकिंग खोलते हैं। तालियां बजती हैं। उसे सीने से चिपकाते हैं और मुस्कराते रहते हैं। मोबाइल क्लिक-क्लिक करते हैं और लाइव स्ट्रीमिंग करते वीडियो तुरत यू-ट्यूब पर लाद दिए जाते हैं, और दुनिया को मालूम हो जाता है कि एक नई किताब आई है और बिना पढ़े लाइक्स पर लाइक्स, अद्भुत-अद्भुत जैसे दिव्य वचन बरसने लगते हैं, तो लेखक को लगता है, उसके आगे प्रसाद-निराला भी किस खेत की मूली हैं?
उसका लोकार्पण दो लाइन की खबर तक न बना, जबकि उसके लोकार्पण ने अखबार के दो कॉलम मारे- इस ‘भेदभाव’ से जो न जले, वह लेखक कैसा? दूसरे को चढ़ते देख जैसा ‘ध्वंसात्मक’, लेकिन ‘रचनात्मक’ आत्मसंघर्ष शुरू होता है, वही लेखक की कलम चलवाता है। उसकी प्रेरणा उसकी जलन में होती है।
ईष्र्या-द्वेष जिस तरह से नए-नए अर्थों को ‘डिकंस्ट्रक्ट’ करते-कराते हैं, इसकी खबर देरिदा तक को नहीं थी। अपना हर लेखक देरिदा का बाप है। वह हर टेक्स्ट के ‘दमित अर्थों’ को, उसके इरादों को पहले क्षण में ही खोल देता है। हिंदी लेखक शुरू से अंत तक नाना प्रकार से ईष्र्या-द्वेषों में जीता-मरता है। जो जले नहीं, वह लेखक क्या? जो धुआं न दे, वह लेखक कैसा?
लेखक से अधिक ज्वलनशील पदार्थ कोई दूसरा नहीं। कब भभकने लगे, कब धुआं देने लगे, कब शाप देने लगे, इसे विधाता भी नहीं जानता। वह जितना जलता है, उतना ही उसका साहित्य फलता है। हिंदी के लेखक की यही ‘डाइलेक्टिक्स’ है। 
इसी वजह से लेखकों के स्वास्थ्य की चिंता सताती है। मेले में लेखकों को देख सोचने लगता हूं कि पिछली बार ये मिला था तो ठीक था, इस बार इसे क्या हुआ? लगता है, इसका लोकार्पण नहीं हुआ। 
हर बड़ा लेखक जल-जलकर ही बड़ा बनता है।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 12 january