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साहित्य की दिल्ली हाट

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकार

अपनी दिल्ली लेखकों की सबसे बड़ी ‘हाट’ है। यहीं साहित्य की आजादपुर मंडी है, जहां साहित्य के भाव रोज खुलते और बंद होते हैं। यहां सभी ‘क्लास’ के, सभी ‘स्तर’ के, सभी ‘भाव’ के यानी ‘वैल्यू’ के लेखक/लेखिकाएं मिलते हैं। इनमें कुछ ‘बढ़े भाव’ वाले होते हैं। कुछ ‘सड़े भाव’ वाले होते हैं, कुछ ‘अड़े भाव’ वाले होते हैं, कुछ ‘पड़े भाव’ वाले होते हैं, कुछ ‘खड़े भाव’ वाले होते हैं, कुछ ‘कड़े भाव’ वाले होते हैं, कुछ ‘छड़े भाव’ वाले होते हैं।
इसी तरह अपने यहां कुछ ‘घटे भाव’ वाले लेखक होते हैं। कुछ ‘पटे भाव’ वाले होते हैं। कुछ ‘सटे भाव’ वाले होते हैं और कुछ ‘फटे भाव’ वाले भी होते हैं। कुछ ‘ग्रांड सेल’ वाले होते हैं। कुछ के आगे तो यह भी लिखा होता है- एक के साथ दो फ्री। 
इसी हाट में कुछ ‘अति-भाव खाए’ लेखक भी पाए जाते हैं। इनको ‘ओवर-रेटेड’ लेखक भी कहा जाता है। ‘ओवर-रेटेड’ लेखक वो होता है, जो बिना किसी ‘तत्व’ के और वक्त से पहले साहित्य की सारी माल-मलाई ‘लूट’ कर साहित्य के शीर्ष पर विराजमान हो जाता है।
ऐसे एक दर्जन स्थापित बड़े लेखकों और लेखिकाओं को यह चिर ईष्र्यालु भी जानता है, जिनने अपने ‘भाव’ अपनी ‘हैसियत’ से ज्यादा रखे हैं। इन जन्मजात ‘प्रातिभों’ को साहित्य के कुछ ‘महंतों’ ने इनके पहली लाइन लिखते ही ‘महंतई’ प्रदान कर दी थी। ये उसी महंतई को अपना ‘हक’ माने बैठे हैं। इनके तेज के आगे कालिदास और भवभूति से लेकर प्रसाद, निराला, महादेवी और मुक्तिबोध तक ‘खद्योत सम’ नजर आते हैं। जर्मन ग्रेयर और मारक्वेज तो इनकी चरण-चंपी करते दिखते हैं।
फिर इस दिल्ली हाट में बहुत से लेखक ‘बेभाव’ वाले भी होते हैं। ये न अपना भाव जानते हैं, न जनवाते हैं। ये साहित्य के प्रति इतने ‘समर्पित’ होते हैं कि सबको लिफ्ट देते हैं, भले इनको कोई लिफ्ट दे, न दे। दिल्ली के साहित्य की हाट इन्हीं की वजह से भरी-पूरी दिखती है। यही साहित्य के ‘भावक’ होते हैं, यही साहित्य के ‘रसिक’ होते हैं। यही उसके ढोल-मंजीरे होते हैं। ये हर गोष्ठी-सेमिनार की जान होते हैं और वक्त-बेवक्त करतल ध्वनि करते पाए जाते हैं।
ये लेखकों में ‘सौम्य संत’ की तरह होते हैं। ये न किसी का कुछ बिगाड़ पाते हैं, न अपना कुछ बना पाते हैं। ये न किसी ‘मारक्वेज’ की जेब काट पाते हैं, न किसी बोरखेज की कहानी ही चुरा पाते हैं। बताइए, ऐसा लेखक किस काम का, जो न किसी की रचना को चुरा सकता है और न मार सकता है?  
दिल्ली की हाट में तीसरी तरह के लेखक वे होते हैं, जो नेताओं से भी अधिक कुशल ‘मौसम वैज्ञानिक’ होते हैं। देशकाल वातावरण का तापमान क्या है और क्या होने वाला है? उसकी भनक इनको पहले से लग जाती है। किसकी हवा है? कितनी हवा है? कैसी हवा है? कौन जाने वाला है? कौन आने वाला है? किसका क्या होने वाला है? कब कौन क्या बनने वाला है? किस-किस का राज होने वाला है? किसके किससे कैसे संबंध हैं? किसकी किससे सीधी नेटवर्किंग है? कौन किसके ‘टोले’ में है? कौन किसके ‘झोले’ में है? कौन किसकी कब-कब हाजिरी बजाता है? जिसने साहित्य का यह मूल मंत्र जान लिया, साहित्य की दिल्ली हाट को उसी ने ‘सांट’ लिया।
यह ‘हाट’ ही ‘साहित्य’ है और यही आज की ‘साहित्य साधना’ है। जिसने ‘साहित्य की दिल्ली हाट’ के ये खेल जान लिए, उसी ने हाट को लूट लिया। तो आइए मिलते हैं- ‘साहित्य की दिल्ली हाट’ में।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 10 march