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आपके शहर में लोकार्पण डॉटकॉम

सुधीर पचौरी

अब किसी लेखक को परेशान होने की जरूरत नहीं। जो लेखक हो चुके हैं, जो हो रहे हैं, जो होने वाले हैं या जो न होने वाले हैं, वे भी अब निश्चिंत रहें! आपके शहर में आ चुका है लोकार्पण डॉटकॉम।
अब किसी को किसी महान, बड़े, वरिष्ठ लेखक का मुंह जोहने की जरूरत नहीं। न बार-बार फोन करके मनाने की जरूरत है कि अगर आपका आशीर्वाद मिल जाता, तो...। न किसी से निहोरे करने की जरूरत है कि सर, आपके आए बिना लोकार्पण संभव न होगा। अब सीधे संपर्क करें- लोकार्पण डॉटकॉम। 
जब चाहें कराएं, लोकार्पण कराएं, चकाचक कराएं, छकाछक कराएं, टकाटक कराएं, पकापक कराएं, चटाचट कराएं, झटाझट कराएं, मोचन कराएं, विमोचन कराएं, अर्पण कराएं, समर्पण कराएं। काम एकदम तसल्लीबख्श होगा। जब तक आपको तसल्ली नहीं, तब तक हमें तसल्ली नहीं। र्
ंहदी वाला हूं। मुझसे हिंदी वालों की परेशानी देखी नहीं जाती। जब-जब खबर आती है कि फलां की पुस्तक का लोकार्पण होने वाला है या हुआ, माथा ठोक लेता हूं, कैसा मूर्ख है, जो दिल्ली के ठगों के हाथ फंस गया। अब सब तरफ से लुटेगा और मिलेगा कुछ नहीं। 
बस एक जगह दो लाइन की खबर आएगी कि फलां का लोकार्पण हुआ... इन दो लाइनों को चाटते रहो। जानता हूं। जिसे ‘लिखास’ ने काटा होता है, वही दिल्ली दौड़ता है। यहां वह सबसे पहले किसी बिचौलिए के जरिर्ए ंहदी के कुछ स्थाई भावनुमा तत्वों तक पहुंचता है कि वे उसकी पुस्तक का लोकार्पण करें। आदरणीय ‘उंह-आंह’ करके कहते हैं कि हां, आं...आं देखते हैं। अच्छा पहले उनसे बात कर लो। कहां करना है, कैसे करना है, वह बता देंगे। 
बिचौलिया लोकार्पणीय से कहेगा- पचास हजार तो लग ही जाएगा। लोकार्पणीय कहेगा- कोई नहीं, चलेगा। बताइए, कब और किसे दूं?
बिचौलिया समझ जाएगा कि मुरगा कटने को तैयार है। और आप पाएंगे कि एक शाम वह कट चुका है। दो लाइन की खबर आ चुकी है कि लोकार्पण हो चुका है। फेसबुक पर वे दो लाइनें चिपकी हैं और सौ दो सौ लाइक्स मिल चुके हैं। दिल्ली है ही ऐसा शहर।  र्
ंहदी वाला स्वभाव से साहित्यकार होता है। वह और कुछ बनना चाहे न चाहे, साहित्यकार अवश्य बनना चाहता है। अपनी कीर्ति का पताका फहराने के लिए वह कुछ भी कर सकता है, दस-बीस या पचास हजार क्या चीज है?र्
ंहदी में साहित्यकार की बड़ी महिमा है। उसकी बड़ी कद्र है। साहित्यकार होना एक ‘मिथ’ है। उसे सम्मान से देखा जाता है। कवि बनने के लिए किसी अतिरिक्त योग्यता की जरूरत नहीं। कवि कोई भी हो सकता है। कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है! 
हिंदी वाला सोचता है: शहर जीत लिया है, अब साहित्य जीतना है। एक बार दिल्ली जीत ली, तो सब जीत लिया समझो! इसलिए हर्र ंहदी वाला दिल्ली जीतने आता है और दिल्ली जीतकर जाता है। इसे ही लोकार्पण कहा जाता है और अब तो लोकार्पण अपने आप में एक कला-उद्योग बन चला है। इसी कारण मैंने तय किया है कि अगले पुस्तक मेले में बाजाप्ता लोकार्पण की दुकान खोलूंगा, ताकि किसी लेखक को कोई परेशानी न हो। लोकार्पण का एक रेट कार्ड रहेगा।
आप ही सोचें, जब मुंडन का रेट हो सकता है, नामकरण का रेट हो सकता है, तो लोकार्पण का क्यों नहीं हो सकता? सोलह संस्कारों वाले इस देश में लोकार्पण-संस्कार भी होना चाहिए।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 10 february