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लेखक का फिटनेस टेस्ट

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकार

आपके लेखन का उद्देश्य क्या है?
ठोकना।
किसे ठोकना?
जो अपने को कुछ ज्यादा समझता हो।
ऐसा कौन है, जो खुद को ज्यादा न समझे?
तो सभी को ठोकना है।
आप सबसे नाराज हैं क्या?
सबको प्यार करता हूं, इसीलिए ठोकता हूं।
ठोकने में आपकी नाराजी झलकती है?
ये नाराजी नहीं, ये अपना स्टाइल है।
ये कौन सा स्टाइल है?
यह मेरा स्टाइल है। 
इससे क्या मिलता है?
अबे मिलना-विलना क्या है? जब तक आप किसी को कसके ठोकते नहीं, तब तक कोई आपके बारे में सोचता नहीं। जब ठोक देता हूं, तो बड़े से बड़ा बंदा कहता है यार! अब बस कर। चल दोस्ती करते हैं। मैं तो सुबह से ही ठोकने लगता हूं और जिसको ठोकता हूं, शाम तक ‘फ्रेंड्स रिक्वेस्ट’ भेजने लगता है।
ये चमत्कार कैसे होता है?
वत्स! यह बेशर्म जगत धंसमार से चलता है-‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ से। हिट करोगे, तो फिट कहलाओगे। जो जितना ‘हिट’ करता है, उतना ही ‘फिट’ कहलाता है।
लेकिन बड़े लेखक तो महान उद्देश्यों की बातें करते हैं। समाज को सुधारना, समाज को अच्छा बनाना, समाज को सुंदर बनाना, करुणा का वातावरण बनाना, जनतांत्रिक वातावरण बनाना, टॉलरेन्स का वातावरण बनाना, समाज को मुक्ति की राह दिखाना।
सब बकवास है। समाज को सुधरना होता, तो सुधर न गया होता। आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल, आधुनिक काल, सब गए। यह साहित्य का ‘फेसबुक काल’ है। ‘फ्री फॉर ऑल’ है। तू भी फेसबुक पर होता, तो ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें नहीं करता।
मैं तो आपकी रचनाओं को पढ़ते हुए बड़ा हुआ। उनमें तो बहुत ऊंची-ऊंची बातें हैं। 
चमचागीरी मत कर। सभी लेखक ऐसे ही हांका करते हैं। जो जितना ‘उच्च’, वह उतना ही ‘तुच्छ’, वो भी किसी न किसी की ‘पुच्छ’। किसी की ‘पुच्छ’ का ‘गुच्छ’ न बन। ‘तुच्छ’ और ‘लुच्च’ बन। इन दिनों ‘लुच्च’ की ही ‘पुच्छ’ है। मैं ‘टॉप क्वालिटी’ का ‘लुच्च’ हूं। 
तब मुझे क्या करना चाहिए गुरुवर?
फेसबुक पर आजा और नित्य सुबह-शाम इसे ‘हिट’ कर, उसे ‘फिट’ कर और सबके लेखन पर ‘शिट’ कर।
क्या इससे साहित्य में छा सकता हूं? 
क्यों नहीं? कलम घसीटना बंद कर और किसी को हिट करना शुरू कर। फिर देख कितना बड़ा लेखक बनता है।
मैं ‘हिटूंगा’ तो ‘पिटूंगा’, फिर साहित्य में गिट-पिट कैसे करूंगा?
तू कायर है। ‘पिटेगा’ तभी ‘हिटेगा’। हिटने व पिटने की हैबिट बना। ‘हिट’ और ‘पिट’ ही साहित्य है। जो जितना हिट करता है, वह उतना पिटता है, उतना ही ऊंचा साहित्यकार कहलाता है। साहित्य की ‘नई डाइलेक्टिक्स’ यही है।
क्या अध्ययन-मनन की जरूरत नहीं?
जिनने पढ़ा, उनने ही क्या उखाड़ लिया? बस, बोरियत के बोरे छोड़ गए। न कोई हंगामा, न हल्ला, न उखाड़, न पछाड़। जब देखो, तब बंदा सिर्फ ‘आत्मसंघर्ष’ कर रहा है। अपने को ही हिट किए जा रहा है। अपने को क्या हिट करना? जिसने तुझे हिट किया, उसे हिट कर। हम दूसरों को पहले हिट करते हैं, फिर वे हमको हिट करते हैं। यही अपने लेखन का ‘फिटनेस टेस्ट’ है।

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  • Web Title:tirchi najar hindustan column on 1 july