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इमोजी साहित्य का युग

सुधीर पचौरी

एक अज्ञात कुलशील लेखक द्वारा वाट्सएप पर भेजी रचना को पढ़कर मैंने लिखा कि आपकी रचना अच्छी लगी, ऐसे ही लिखते रहें। उधर से जो आए, वे तीन ‘इमोजी’ थे। मेरे वाट्सएप पर बहुत ही छोटे-छोटे आकार के तीन जोड़ी नन्हे- मुन्ने हाथ जोड़कर ‘पिरनाम’ किए जा रहे थे। ये उस लेखक के नहीं, साइबर संसार में फ्री में उपलब्ध चिन्ह थे।

मेरे आठ शब्दों के बदले उसका ये ‘पिरनाम’ प्रथम दृष्टया मुझे प्रिय लगा। युवा लेखक की यह स्मार्टनेस मुझे कुछ पल को अच्छी लगी, पर दूसरे ही पल महसूस हुआ कि यह लेखक है कि पाजामा? इसे तो साहित्य की तमीज तक नहीं। पहले तो अयाचित भाव से मुझे लिख भेजता है कि पढ़ो और जब जबाव में लिखता हूं, तो नि:शब्द हो जाता है और बनी बनाई तीन मुद्राएं भेज देता है। उसे मालूम नहीं कि ‘पिरनाम’ करने के भी अपने तौर-तरीके होते हैं। ‘प्रणाम’ का असली भाव छपे छपाए चित्र से पूरी तरह व्यक्त नहीं होता। यह सिर्फ मुद्रा भर है, लेकिन साहित्य सिर्फ जड़ मुद्रा नहीं होता। 

लगता है कि आज सोशल मीडिया के अनेक साहित्यकारों के पास यही न्यून चिन्ह-भाषा बची है। उनके पास न पर्याप्त शब्द हैं, न वाक्य और न संवाद। आपने सोच-समझकर कुछ शब्द लिखे, उसने तुरंत फ्री के बने-बनाए इमोजी मारे और संवाद खत्म। ‘इमोजी’ होना और बात है, इमोशनल होना और बात। इमोजी होना चिन्ह में फिक्स होना है, इमोशनल होना जिंदा होना है। शब्द संवाद करते हैं, चिन्ह संवाद को ही खत्म कर देते हैं। सामने कोई पिरनाम करे, तो आप गले लगाएंगे। साइबर स्पेस में क्या घंटा लगाएंगे? सोचा कि कभी मिलेगा, तो कहूंगा कि यदि ऐसा करते रहे, तो एक दिन अपनी अभिव्यक्ति कला को भी खो दोगे मित्र।

फिर यह सोचने लगा कि अगर मैंने ऐसा समझाया और उसने फिर दो-चार दैत्याकारी खूंखारी किस्म की मुद्राएं भेज दीं, तो? मैं तो कहीं का न रहूंगा। रात में सपने में वही मुद्राएं डराती रहेंगी। कैसा जमाना आ गया है? देखते-देखते अच्छा भला बंदा इमोजी हुआ जाता है। शब्दकोश को भूलकर आजकल हर बंदा इमोजी-इमोजी करने लगा है।  

एक दिन एक और इमोजी लेखक मिल गए, तो मैंने पूछा- कहां? बोले ब्रेड खरीदने जा रहे हैं। मैंने पूछा- कैसे खरीदेंगे? क्या ब्रेड के बदले इमोजी से काम चलांएगे? वह झटका खा गए। कहने लगे- ब्रेड लेनी है, तो कैश देना है। साहित्य की बात अलग है। मैंने कहा- साहित्य का मतलब इमोजी कब से हो गया? साहित्य की दुनिया अनंत है। इमोजी सिर्फ शॉर्टकट है। सौ-दो सौ इमोजी में वह नहीं समाने वाला नहीं। नई पीढ़ी तकनीक निर्भर है। इसके जीवन में ‘मसि कागद’ बहुत कम हैं। कलम सिर्फ हायर सेकंड्री तक ही ‘गही’ है।

अब अभिव्यक्ति का मतलब एक ‘इमोजी’ है। रचना का मतलब भी ‘इमेाजी’ है। एक थे मुक्तिबोध, जो जिंदगी भर ‘अभिव्यक्ति’ की खोज करते रहे और वह मुई मिल के न दी। दूसरे थे अज्ञेय कि लाख बजाई, लेकिन वीणा बज के न दी। और आज हैं सोशल मीडिया के लाखों साहित्यकार, जो तुरत-फुरत इमोजीबाजी कर-करके सबकी वीणा बजाते रहते हैं।

फिर भी कोई न कोई कहता ही रहता है कि अभिव्यक्ति की आजादी को खतरा है। अरे काहे का खतरा? काहे की अभिव्यक्ति? इमोजी हैं तो। साहित्य रहे न रहे, इमोजी तो रहेंगे। इमोजी को ओढ़ो और इमोजी बिछाओ। यही कविता है। यही कहानी है और यही आज की आलोचना है।
 

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  • Web Title:Sudheesh Pachauri article in Hindustan on 2nd of september