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साहित्य का घड़ा युग

सुधीर पचौरी

इन दिनों साहित्य करने मैं जहां-जहां जाता हूं, वहां-वहां से चीनी मिट्टी का एक न एक ‘कप’ लेकर अवश्य आता हूं। हर कप पर देने वाले का स्मृति चिह्न छपा होता है। मेरे पास बीस-बाईस कप जमा हो गए हैं। हर सुबह, दोपहर, शाम इनमें चाय पीता-पिलाता हूं। हर वक्त ख्याल रखता हूं कि धुलते वक्त साहित्यिक भावनाओं की तरह ये कहीं टूट-तड़क न जाएं। जब से कप आए हैं, मुझे लगता है कि इनके और साहित्य के बीच इन दिनों बड़ा ही अंतरंग संबंध है। 

मेरे लिए ये सिर्फ कप नहीं, साहित्य के इतिहास हैं, भूगोल हैं। ये साहित्य के नए ठिकानों (पब्लिक स्फीयर) के द्योतक हैं। ये बताते हैं कि इन बरसों में साहित्य कहां-कहां गया? इस कंजूस समय में उसे कहां से क्या नसीब हुआ?

बाईसवीं सदी में जब कोई हिंदी साहित्य के इतिहास की खोज में ‘इंडियाना जोन्स’ बनकर मयूर विहार की खुदाई करेगा और ये कप उसे मिलेंगे, तोे इन पर छपे स्मृति चिह्न उसे बताएंगे कि 2018 के अक्तूबर में किस कॉलेज ने, किस संस्थान ने इस साहित्यकार की प्यास बुझाने की चिंता की। ये बताएंगे कि इस दौर का साहित्यकार ऐसा पियक्कड़ हुआ करता था कि जहां जाता, वहीं से कप लेकर आता था।

असली साहित्य वही होता है, जो विरुद्धों में भी सामंजस्य स्थापित कर देता है। साहित्य में कप की एंट्री ने यही किया है। बहुत दिनों बाद हिंदी साहित्य में एक नया युग आया है : ‘कप युग’। कोई सौ बरस पहले प्रेमचंद ने साहित्य में ‘चिमटे’ का प्रवेश कराया था। याद करें ईदगाह।  सौ साल बाद अब ‘चिमटे’ की जगह ‘कप’ की एंट्री हुई है। जिस तरह हामिद के संसार को चिमटे ने बदला था, उसी तरह हमारे साहित्य-संसार को ‘कप’ ने बदला है। 

जब-जब साहित्य के स्पद्र्धियों को धूल चटाकर, मिले हुए कप को हाथ में लिए आता हूं, तब-तब अपने को किसी विराट कोहली से कम नहीं समझता। कप की वजह से साहित्य में इन दिनों खेल भावना बढ़ी है। जो एक-दूसरे को जितना लतियाते-जुतियाते हैं, वही कप के हकदार होते हैं। कप सिर्फ कप नहीं है। वह साहित्य की मंदी के दिनों का साथी है।

यूं भी यह युग कंजूसों का है। इन परम कंजूस दिनों में कप ने ही साहित्य को सहारा दिया है। बीस-पचास रुपये में साहित्यकार का सम्मान और अपने स्मृति चिह्न के साथ कप का दान। लेन-देन बराबर। आयोजक आपको याद रखें, पर आप भी तो आयोजकों को याद रखें। ‘कप’ साहित्य का ‘म्यूचुअल फंड’ है। यूं भी साहित्य के बदले मिलता क्या है? एक पुष्पगुच्छ, जो इस कदर गंधहीन होता है कि उस पर मच्छर तक मंडराना पसंद नहीं करते। अंगवस्त्रम इतना झीना होता है कि उसे देखते ही कबीर की ‘चदरिया’ याद आने लगती है। पर जब ‘कप’ मिलता है, तो साहित्यकार को मंच पर  हीरसो वै स: की अनुभूति होने लगती है।

मैं तो उस दिन का इंतजार कर रहा हूं, जब कप की जगह साहित्यप्रेमी, साहित्यकारों को मिट्टी के बने कुल्हड़ देने लगेंगे। जिस दिन कप का युग समाप्त होगा और कुल्हड़ युग आएगा, उसी दिन साहित्य अपनी मिट्टी से जुडे़गा। फिर एक दिन ऐसा भी आ सकता है, जब साहित्य के प्रति सम्मान भाव और ज्यादा बढे़ और लोग साहित्यकारों को सम्मान स्वरूप मिट्टी का घड़ा ही देने लगें। मुझे यकीन है, आज साहित्य में ‘कप युग’ आया है, कल ‘कुल्हड़ युग’आएगा। और कुल्हड़ आया, तो तय मानिए ‘घड़ा युग’ भी दूर नहीं। एक दिन हम सबको साहित्य के बदले घड़ा अवश्य मिलेगा।

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  • Web Title:Sudheesh Pachauri article in Hindustan on 28 october