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रिजेक्टेड साहित्य का धमाल

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकार

इन दिनों अंग्रेजी में ‘ट्विटर’ पर एक ‘हैशटैग’ चल रहा है, जो कहता है: ‘अपनी रचना के रिजेक्शन के बारे में बताओ’। बड़े-बड़े लेखक अपने-अपने रिजेक्शनों को बताने में लगे हैं। मार्सल प्रूस्त, विलियम फकनर, सेमुअल बेकेट, जन ला कारे-एनी फ्रेंक, विलियम गोल्डिंग, मार्गरेट मिचेल आदि पचासियों लेखक-लेखिकाओं के बारे में बताया जा रहा है कि उनकी वे कृतियां, जो बाद में महान बनीं, कितनी-कितनी बार रिजेक्ट हुईं। हैरी पॉटर सीरीज की लेखिका जेके रोलिंग को 12 बार रिजेक्ट किया गया, तब जाकर ब्लूम्सबरी ने छापा और वह सबसे अमीर लेखिका बन गईं। 

‘हैशटैग’ की बात छोड़िए, कुरेदने पर भी कोई हिंदी वाला नहीं बताता कि किस प्रकाशक ने उसकी भी कौन सी किताब रिजेक्ट की। ‘रिजेक्ट’ होना आज गौरव की बात है। लेखकों को अपने परिचय में लिखना शुरू कर देना चाहिए- ‘इक्यावन बार रिजेक्शन प्राप्त’। भविष्य में वही बड़ा लेखक कहलाएगा, जो सबसे अधिक बार रिजेक्ट हुआ होगा। ‘रिजेक्शन’ ही लेखक को महान बनाता है। 

इतिहास बताता है कि जो प्रेम में रिजेक्ट हुआ, वही महान कवि कहलाया। कवि घनांनद जी को देखिए। न उनकी ‘प्यारी सुजान’ उनको रिजेक्ट करती, न वह जीवन भर मारे-मारे फिरते, न विरह उनको सताता, न वह सुजान हित  यानी ‘सुजान के लिए’ छंद लिखते और न हिंदी साहित्य में अमर होते। सुजान रिजेक्ट न करती, तो घनानंद क्या घनानंद होते? 

लेखक का रिजेक्ट होना, उसके महान लेखक बनने की निशानी है। शायद इसी वजह से अंग्रेजी जगत में इन दिनों रिजेक्ट हुए लेखकों का ऑनलाइन ‘शेयर योर रिजेक्शन’ ट्विटर अभियान चल रहा है। हिंदी में भी लेखक रिजेक्ट होते हैं, ‘सधन्यवाद वापस’ होते हैं, लेकिन जैसे ही वे रिजेक्ट होते हैं, रिजेक्ट करने वालों का एहसान मानने की जगह वे उन्हीं को गरियाने लगते हैं।  

मैं तो कहता हूंं कि हिंदी वालों को भी अपने बारे में सच बोलने की आदत डाल लेनी चाहिए, तभी अंग्रेजी वालों के लेवल के हो पाएंगे। हिंदी का लेखक दुनिया का सच तो बताएगा, मगर अपना सच हरगिज न बताएगा। अपने बारे में सच बोलने का आदी हो, तो बोले। और इन दिनों तो हिंदी का हर लेखक अपने को जन्मजात महान समझता है। बची कसर सोशल मीडिया ने पूरी कर दी है। अब कोई किसी से स्वयं को ‘रिजेक्ट’ कराने का प्रयत्न क्यों करे? अब तो लेखक है। लेखक का ब्लॉग है। फेसबुक है। ट्विटर है। जो मन आए, लिखो। किसी का अपमान करना हो, तो करो। किसी को गरियाना हो, तो मन भर गरियाओ। अब तो हर बंदा स्वयं ही लेखक है। स्वयं ही प्रकाशक। स्वयं ही संपादक। स्वयं ही विक्रेता और क्रेता। ऐसे में, किसकी मजाल, जो लेखक को रिजेक्ट करे? अब तो लेखक खुद ही अपने को रिजेक्ट कर सकता है और ऐसी मूर्खता वह करने से रहा।

सो अब कोई लेखक न ‘रिजेक्ट’ होता है, न ‘डिजेक्ट’ होता है। वह तो अपने ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर पर आता है और जिस-तिस में दो-चार धौल जमाकर लेखक बन जाता है। लेकिन ‘रिजेक्टेड माल’ की अपने समाज में बड़ी इज्जत है। अमेरिका की पुरानी रिजेक्टेड और कंडम किताबें कनॉट प्लेस की पटरियों पर बिछी रहती हैं। न ये लेखक रिजेक्ट होते, न पटरी पर उनका साहित्य धमाल मचाता।

इसीलिए मैं कहता हूं कि रिजेक्ट होना सीखो। जितना रिजेक्ट होगे, उतने ही बडे़ लेखक बन पाओगे।

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  • Web Title:Sudheesh Pachauri article in Hindustan on 26 august