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मैं भी साथी मानस पाठी

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकार

जब से मेरे गुरुजी ने कहा है कि वो तो रामचरित मानस  के पाठी हैं, तभी से मेरा मन ‘माक्र्स’ का पल्ला छोड़ ‘मानस’ का दामन थामने की सोच रहा है। व्यास जी ने कहा है, जिस मार्ग पर महान विभूतियों के चरण पड़ें, वही सही मार्ग है।

मैंने अगर किसी को माना, तो अपने गुरुजी को माना। जिस तरह कबीर के रामानंद थे, उसी तरह वो मेरे नामानंद हैं। अपने परम श्रद्धेयों का नाम जुबान पर लाना महापाप माना जाता है, इसीलिए गुरु नामानंद का असली नाम अपनी जुबान पर नहीं ला रहा हूं। वह मेरे गुरु, मैं उनका एकलव्य। वह कलजुगी, तो मैं उत्तर-कलजुगी। उनने सबके अंगूठे काटे, मैंने उनका ही काट लिया। वह मेरे लीडर, मैं उनका फॉलोअर। वह दाता, मैं पाता। वह ज्ञानी, मैं उनके आगे पानी-पानी। वह डाल-डाल, मैं पात-पात। इसीलिए वह जो कहते हैं, वह मेरे लिए आप्तवाक्य होता है। आंख मूंदकर उसी लाइन पर चलता हूं। वह रहे प्रगतिशील, हम रहे जनवादी। वह रहे ‘पंडात्मक आधुनिकवादी’, हम  रहे ‘फंडात्मक उत्तर-आधुनिकवादी’।

लेकिन उनके प्रति अपनी श्रद्धा को कभी वृद्ध नहीं होने दिया। इसीलिए जब उनने कहा कि वह आजकल मानस का पारायण करते हैं, तो हम भी गीता पे्रस वाला गुटका निकाल लाए। गुरु करें मानस का पाठ, तो चेला क्यों न करे अखंड पाठ। कहते रहें अशोक वाजेपयी ‘अचूक अवसरवादी’, हम तो कहेंगे कि ‘मत चूके चौहान’।
जब तक माक्र्सवाद चला चला, तब तक सेकुलर बिका बिका। जब अमेरिकी नव्य-समीक्षा आई, तो नव्य-समीक्षक हो लिए। और अब, जब सब अपने-अपने जनेऊ दिखाते फिर रहे हैं, तब अपने गुरुजी क्यों पीछे रहें और क्यों न सबको बताएं कि ‘मैं तो साथी मानस पाठी’।

मार्क्स से मानस तक। यही तो हिंदी के आचार्य का असली वर्ग-संघर्ष है। पता नहीं, नई कविता के केंद्र में मुक्तिबोध हैं भी कि नहीं, लेकिन इतना तय  है कि गुरुजी वाले मार्क्सवाद के केंद्र में ‘मानस’ है। जब उनके केंद्र में मानस है, तो अपने केंद्र में मानस का ही ‘चानस’ है।

अस मानस मानस चख चाही। मानस के लिए मानस के ही चक्षु चाहिए। उनके तो न जाने कब से खुले थे, मेरे अब खुले हैं। उन्होंने कहा कि वह हमेशा से पाठ करते आए हैं, तो मैं क्यों नहीं कह सकता कि ‘मैं भी साथी मानस पाठी’?

जैसा गुरु, वैसा चेला। जैसी चवन्नी, वैसा धेला। जैसी मिट्टी, वैसा ढेला। जब तक माक्र्सवादी सोप में खुशबू रही, उसी से नहाए। जब अमरीकी न्यू क्रिटिक्स का शैंपू आया, तो उसी से केश धोए। अकादमी तक महके-महकाए। अब जब सब मानस ब्रांड सोप से नहाते हों, तो उसी से क्यों न नहाएं? कहीं तो होगा कोई, जो इस सोप की खुशबू पहचानेगा और इस मानस भक्त की आर्त-पुकार सुनेगा। करेगा उद्धार।

मन कर रहा है कि एक नई विनय पत्रिका लिख डालूं, जिसमें तुलसी के उस पद को उधार लेकर कहूं- कबहुं क अंब, अवसर पाइ/ मेरिऔ सुधि द्याइबी कछु करुण कथा चलाई...

हे माता, जब अवसर मिले, तो प्रभु जी को मेरी भी सुधि दिलाना, लेकिन उससे पहले कुछ करुण-कथा चलाना कि आपका एक भक्त ऐसे टॉप का पापी है कि उसे देख ‘अघी’ तक ‘अघाते’ हैं, वही आज आपकी किंचित कृपा चाहता है। माक्र्स से मांगा, तो मुक्तिबोध मिले। पर मुक्ति नहीं मिली। वह मानस से ही मिलेगी। अपने गुरु को आजकल यही लगता है, इसीलिए मैं मानस का अखंड पाठ शुरू करने जा रहा हूं। आप सभी आएं, साथ में ढोल मजीरे भी लाएं। 

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  • Web Title:Sudheesh Pachauri article in Hindustan on 24 june