DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

हिंदी साहित्य का फेक युग

सुधीर पचौरी

इन दिनों सर्वत्र ‘फेक’ यानी नकली का बोलबाला है। अपना हिंदी साहित्य भी फेक युग में प्रवेश कर गया है। इसी कारण मुझे बहुत सा साहित्य फेक नजर आता है। जब ‘फेक न्यूज’ हो सकती है, ‘फेक माक्र्सशीट’ हो सकती है, फेक नोट हो सकते हैं, फेक आदमी हो सकते हैं तो फेक आर्टिस्ट क्यों नही हो सकते।

‘गुएर्निका’ और ‘मोनालिसा’ के चित्र ‘फेक’ हो सकते हैं -‘ब्रेख्त’ ‘फेक’ हो सकते हैं, तो ‘फेक कविता’, ‘फेक कहानी’, ‘फेक उपन्यास’और ‘फेक आलोचना’ क्यों नहीं हो सकती? आलोचक हूं इसलिए गांरटी से कह सकता हूं कि हिंदी आलोचना तो अपने जन्म से ही ‘फेक’ है। 

मेरा तो दावा है कि इन दिनों हिंदी में दर्जनों कवि ‘फेक कवि’ हैं। उनकी कविताएं ‘फेक कविताओं’ के नमूने हैं और यही नहीं उनके बहुत से आलोचक तक ‘फेक’ हैं। कइयों को तो मैं पर्सनली जानता हूं। ए टू जेड तक नाम लीजिए या अकारादि क्रम से याद कीजिए। आपको एक से एक ‘फेक’ मिलेंगे। किस किस का नाम लूं? जिसका नाम लूंगा वही दुश्मन हो जाएगा। एक हो, तो उससे निपट लूं। यहां तो ‘फेक’ ही ‘फेक’ भरे हैं। एक से एक ‘फेक’ कवि, एक से एक ‘फेक’ कथाकार, एक से एक फेक आलोचक, यहां तक कि एक से एक फेक समीक्षक।

यह ‘फेकवाद’ और ‘फेंकूवाद’ हिंदी साहित्य में अरसे से चल रहा है। ‘फेक’ असली हो रहा है। असली को ‘फेक’ बनाया जा रहा है। इस ‘फेकवाद’ के बीज हिंदी के मिजाज में छिपे हैं। हिंदी साहित्य में एक शब्द है ‘परंपरा’। यहीं से फेकवादी ‘फेंकू’ बनकर घुसा करते हैं।

यूं भी यह फोटोकॉपी, फोटोशॉप और गूगल ट्रांसलेशन का युग है। किसी अनजान से लातीनी या अफ्रीकी कवि को पकड़ो। सब गूगल पर हैं। उसकी लाइनें गूगल हिंदी ट्रांसलेशन में डालो। जो मिले, उस पर अपना नाम चिपका दो और कवि बन जाओ।

दूसरा तरीका ‘कट पेस्ट’ का है। आप किसी धूमिल टाइप कवि की कविता को पकड़ो। उस के कुछ शब्द काटकर रघुवीर सहाय या सर्वेश्वर के कुछ शब्द चिपका दो। आप श्रीकांत वर्मा के कुछ शब्द बदलकर शमशेर के कुछ शब्द चिपका दो। कोशिश यह रहे कि अर्थ समझ से परे रहे। टाइटिल को भी टेढ़ा कर दो। जैसे ही ऐसी कविता बने- अपना नाम चिपका दो और फेसबुक पर डाल दो और ‘नए मुहावरे वाले’ कवि बन जाओ। किसे फुरसत है कि असली-नकली खोजता फिरे? फिर दिल्ली में आकर कुछ खर्च करके मस्त गोष्ठी कराओ। किसकी मजाल कि आपको कवि न माने? 

‘सब चलता है’ यह भी हिंदी की एक कविता है। ‘फेक कविता’ फोटोकॉपी की मशीन में दबाई। कॉपी बनाई। असली छिपाई, सिर्फ कॉपी बढ़ाई। वाट्सएप जिंदाबाद। पसंद करने वाली मित्र मंडली जिंदाबाद। गोष्ठी हो, काव्यपाठ हो या फेसबुक पेज या ब्लॉग, हर कविता किसी न किसी की नकल नजर आती है। ब्रेख्त से लेकर पाब्लो नेरूदा तक की कॉपियां ही कॉपियां हैं। और रघुवीर सहाय की तो इन दिनों इतनी बढ़िया कॉपियां हैं कि जब तक उनकी किताब न हो,असली रघुवीर सहाय को पहचानना मुश्किल है।

 आलोचना के नाम पर इन दिनों सोशल मीडिया पर यही श्लोक बजता रहता है: उष्ट्राणां विवाहेषु गीतं गायंति गर्दभा! परस्परं प्रशंसन्ति अहो रूपं अहो ध्वनि:!! 

कौन कहता है कि हिंदी ‘कविता का अंत’ हो गया है? फेक बनकर वह अनंत हो गई है!
 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Sudheesh Pachauri article in Hindustan on 21 october