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जयपुर पहुंचना है

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकार

लिटफेस्ट हो, तो जयपुर वाला। पहले खबर ‘ब्रेक’ की गई कि इस बार अंग्रेजी के कॉमिक लेखक नील गैमन आ रहे हैं। गैमन को चाहने वालों ने ट्वीट किया कि ‘पधारो म्हारे देस’ और भैया जी मानो तैयार ही बैठे थे कि कह दिए कि हां, आ रहा हूं। 

जयपुर लिटफेस्ट एक साथ सब कुछ देता है। फ्यूडल महल, मॉडर्न मंच और प्योर पोस्ट मॉडर्न हंगामों की ‘पेस्ट्री’ यहां एक ही जगह तैयार मिलती है। पिछले छह-सात लिटफेस्ट की तो हम जानते हैं। सब हंगामे के लिए जाने गए। दो बार तो रुश्दी ने हल्ला करवाया। जब तक पुलिस न आ गई और केस-वेस न हो गए, तब तक लिटफेस्ट के प्रति लोगों की दिलचस्पी बरकरार रही। एक बार आशीष नंदी फंस गए। केस हो गया, जिसका पता नहीं क्या हुआ, पर इस वजह से लिटफेस्ट खबरों में बना रहा।
इसे सफल बनाने के लिए आयोजकों को क्या-क्या नहीं करना पड़ता होगा? यार तो हंगामा कराके निकल जाते हैं, झेलना उनको पड़ता है, जो आयोजित करते हैं। अब करने को तो चाहे जहां कर लो लिटफेस्ट, लेकिन सब जयपुर की ‘नकल’ करते नजर आते हैं। एक भी तो ऐसा नहीं दिखा, जिसने हल्ला-हंगामा मचवाकर अपनी अलग ‘ब्रांड’ बनाई हो। 

वह भी क्या लिटफेस्ट, जिसमें कोई हंगामा  न हो; जो एक दिन का विवाद भी पैदा करने के काबिल न हो? एक कवि ने कहा है- अंधकार है वहां, जहां आदित्य नहीं है।/ मुरदा है वह देश, जहां साहित्य नहीं है, यानी जहां साहित्य होता है, जिदंगी वहीं होती है। ‘लाइफबॉय’ वाले भी ऐसी ही लाइन कहते रहे हैं- लाइफबॉय है जहां, तंदुरुस्ती है वहां।  इसी तर्ज पर कहा जा सकता है- ‘जयपुर लिटफेस्ट है जहां, हंगामा है वहां।’

वह साहित्य भी क्या साहित्य, जिसे लेकर लोगों में न जिज्ञासा हो, न खबर हो, न उत्तेजना हो, न हंगामा हो। और वह साहित्यकार भी कैसा साहित्यकार, जिसमें जयपुर आने से पहले ही अपना विरोध कराने की क्षमता न हो; जिसके आने से पहले ही सोशल मीडिया बावला न हो जाए और पुलिस वाले शांति-व्यवस्था के लिए पक्का बंदोबस्त न करने लगें? 

अब तक साहित्य के बारे में माना जाता था कि साहित्य का काम ‘वाद, विवाद और संवाद’ करना है, मगर जयपुर वाले लिटफेस्ट ने  साहित्य की परिभाषा ही बदल दी है। अब तो पहले ‘विवाद’ होता है, फिर ‘संवाद’ होता है, और अगर कुछ बचा होता, तो ‘वाद’ यानी ‘मुकदमा’ होता है। 
यही नया ‘लिटफेस्टवाद’ है।

हर अच्छे लिटफेस्ट में कुछ ‘स्थायी भाव’ होते हैं और बाकी ‘व्यभिचारी भाव’ होते हैं। अगर नौ स्थायी न भी हों, तो दो-चार-पांच स्थायी भाव होते ही हैं, जैसे जावेद अख्तर, शबाना आजमी और अपने अशोक वाजपेयी। साथ में दो-चार गौरांग प्रभु और गौरांगनाएं-इनके साथ बहुत से संचारी व्यभिचारी आते-जाते रहते हैं। एक बार हमहूं संचारी कि व्यभिचारी की तरह जा और आ चुके हैं। इसीलिए इन दिनों हम अपने आपको ‘जयपुर पलट’ कहते हैं।

मैं तो कहता हूं कि जो जयुपर वाले में न गया, वह लिटरेचर में हुआ ही नहीं। नील गैमन भी इसी वजह से आ रहे हैं, ताकि ‘जयपुर पलट’ कहला सकें। यूरोप और ट्रंप के अमेरिका में तो साहित्य बचा नहीं है। जो होता है, जयपुर वाले इंडिया में ही होता है। फिर क्या पता, कोई ‘व्यभिचारी’ ही हंगामा करवा दे। इसलिए हमने तो मन बना लिया है कि ‘स्थायी’ की तरह न सही, तो ‘व्यभिचारी’ की तरह ही सही, लेकिन जयपुर पहुंचना है।

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  • Web Title:Sudheesh Pachauri article in Hindustan on 19 august