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मी टू के दौर में साहित्य

सुधीर पचौरी

जब से ‘मी टू’ चला है, मुझे हिंदी साहित्य की चिंता सताने लगी है। हजार बरस के हिंदी साहित्य में शायद ही कोई ऐसी रचना रही हो, जिसमें ‘मी टू’ वाला चित्रण न हो। दुविधा में हूं। साहित्य पढ़ूं, पढ़ाऊं कि अदालत के दरवाजे बैठा रहूं? क्या पता, कब कौन शूर्पनखा किसी लक्ष्मण पर केस कर दे कि इसने मेरी मॉडेस्टी  भंग की थी। और रावण का वकील अदालत से कहे कि इन्हें अंदर करो। उधर लक्ष्मण का वकील कहे कि मेरे मुवक्किल का कोई कसूर नहीं। लक्ष्मण ने उसके एडवांसेस का प्रतिवाद किया था और यह सब तुलसीदास का किया-धरा है, उन्हें पकड़ो? हो सकता है कि शूर्पनखा के चरित्र-हनन के अपराध में तुलसी सीधे काशी के ‘अस्सी’ से धर लिए जाएं।

क्या पता, कोई काशी का अस्सी  पढ़ ले और ‘सेक्सिस्ट’, ‘मिसोजिनिस्टक’ भाषा के अपराध में काशीनाथ पर ही केस कर दे। अब काशीनाथ अदालत में कह रहे हैं,  मैं क्या जानूं यह मिसोजिनिस्टक क्या होता है। मुझे तो भैया ने लिखने को कहा था, सो लिख दिया। 

कुछ भी हो सकता है। आप क्लास में पद्मावत  पढ़ा रहे हैं और पद्मावती को 14 सेकंड से अधिक पढ़ाने यानी घूरने का अपराध कर बैठते हैं। ऐसे में, अलाउद्दीन को तो अंदर जाना ही है, आप भी जाएंगे और संग में जायसी भी जाएंगे। नए कानून के अनुसार 14 सेकंड से अधिक घूरना अपराध है। सबसे आफत तो हिंदी विभागों पर आनी है। वहां तो आद्यंत ‘सेक्सिज्म’ भरा है। जिसे देखो, वही शृंगार, प्रेम, नायिकाभेद बताता रहता है।

अब कृष्ण भक्ति काव्य को कैसे पढ़ाएंगे? गोपियों को मी टू की हवा लग गई, तो सूर, उद्धव और कृष्ण की खैर नहीं। रीतिकाल के कवि तो अंदर जाने ही हैं। बहुत कहला लिए महाकवि और आचार्य। बहुत कर लिए नायिका भेद। अब स्त्रियों को अशोभन तरीके से चित्रित करने के अपराध में रहीम, केशव, मतिराम, बिहारी, देव, पद्माकर, घनानंद आदि सब सड़ो तिहाड़ में। संग में हिंदी के मास्टर भी अंदर। जेल में कवि मास्टरों से पूछते फिर रहे हैं- ये ‘मिसोजिनी’ क्या नई नायिका है क्या? 

जब से भारत का ‘मी टू क्षण’ आया है, हर साहित्यकार हिला हुआ है। हिंदी के कई साहित्य संपादकों ने लेखिका निर्माण में खूब दिलचस्पी दिखाई है। उनका नंबर लग सकता है। भारतेंदु से रघुवीर सहाय तक कोई नप सकता है।

 यशोधरा बुद्ध से लेकर गुप्तजी तक पर केस कर सकती हैं। उर्मिला भी लक्ष्मण और गुप्तजी को लपेट सकती हैं। कामायनी  की इड़ा, प्रसाद और नायक मनु पर ऐसा केस ठोक सकती हैं कि अंदर होकर प्रसाद अपना खंड काव्य आंसू बांचें और मनु महराज उसे सुनकर आठ-आठ आसूं रोते फिरें। 

संस्कृत साहित्य का तो कुछ भी नहीं बचने वाला। बहुत कर लिया ‘उपमा कालिदास्य’, अब भजो बेटा ‘मिसोजिनी दासस्य’। और जयदेव की तो खैर नहीं। गीत गोविंदम्  के लिए सौ साल तक अंदर रहना है।

सबसे ज्यादा फिक्र मुझे उर्दू साहित्य की है। मीर से लेकर फैज तक सब अंदर जाने हैं। और हिंदी फिल्मों व गीतों का क्या करें, जो छेड़खानी छाप है। साहिर का एक गीत तो धमकी तक देता है- तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं, तुम किसी गैर को चाहोगी, तो मुश्किल होगी। इस धमकीवादी गीत पर केस न हो, तो और क्या हो? औरत की आजादी को इस तरह खत्म करनेके अपराध में साहिर के संग राजकपूर भी एक दिन अंदर होंगे और गायक मुकेश को तो थर्ड डिग्री तय ही है।

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  • Web Title:Sudheesh Pachauri article in Hindustan on 14 october