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हिंदी के माथे पर उत्तर आधुनिक तिलक

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकार

ये दिन बड़े ‘हेरा-फेरी’ वाले हैं। यूं तो मैं पहले भी कभी ‘संदेह और भ्रांतिमान’ अलंकारों में फर्क नहीं कर पाया, मगर अब तो मैं ही ‘कन्फ्यूजन’ का अवतार हुआ जा रहा हूं। समझ में नहीं आ रहा कि आजकल के साहित्य में व साहित्यकारों की दुनिया में क्या-क्या, क्यों-क्यों और कैसे-कैसे हो रहा है? हर तरह के उपाय किए हैं, साहित्य का हर सिद्धांत लगाया है कि पता तो चले कि साहित्यकार क्यों बदल रहा है? लेकिन पक्का जबाव अब तक नहीं मिला कि साहित्य में ऐसी विकट उलट-पुलट क्यों है?

कन्फ्यूजन सिर्फ निगेटिव नहीं होता, बल्कि पॉजिटिव भी होता है। कन्फ्यूजन ने बडे़ से बडे़ साहित्यकार पैदा किए हैं। जो जितना अधिक कन्फ्यूज्ड था, वह उतना ही बड़ा साहित्यकार भी हुआ। मैं तो मानने लगा हूं कि ‘कन्फ्यूजन’ बड़ा ही ‘सृजनात्मक’ होता है। जो जितना कन्फ्यूज होता है, उतना ही बड़ा बनकर दूसरों को कन्फ्यूज करता रहता है। 

‘भ्रांति’ न होती, तो न कबीर संत कबीर हुए होते, न तुलसीदास गोस्वामी तुलसीदास। जब तुलसीदास को भ्रम हुआ, तो मानस जैसा महाकाव्य लिखा। जब प्रेम और ज्ञान के बीच उद्धव को कन्फ्यूजन हुआ, तो गोपियों के माध्यम से सूरदास ने उनका भ्रमभंजन कराया। जब कबीर को ‘महाठगिनी माया’ के बारे में कन्फ्यूजन हुआ, तो एक से बढ़िया एक दोहे लिख गए, जो अब तक किसी न किसी अवसर पर याद आते रहते हैं। ये दिन भी सुपर कन्फ्यूजन वाले हैं और इसी कारण सर्वाधिक क्रिएटिव या रचनात्मक सिद्ध हो रहे हैं। शायद इसीलिए, कई खूब पढ़े-लिखे लोगों को कन्फ्यूजन होने लगा है कि वे खुद कौन हैं? क्या हैं? क्यों हैं? 

आजकल तो हॉर्वर्ड और ऑक्सफोर्ड पलट और दिल्ली-सुलट बड़े-बड़े ज्ञानी गुमानी भी राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की शैली में चिंतन करते नजर आते हैं कि वे कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी।  बहुत से अज्ञानियों के ज्ञान-चक्षु तो ऐसे खुले हैं कि जिसे देखो, वही छत पर खड़े होकर दुंदुभी बजाकर घोषित किए जा रहा है कि मैं भी हिंदू हूं, मानो कह रहा हो कि मैं ही हिंदू हूं और हूं तो क्यों हूं?

मेरे ज्ञान-चक्षु भी अचानक ही खुले। जब से खुले हैं, मैं ईश्वर की समकालीन दिव्य लीला देखकर हैरान हूं और पूछता फिर रहा हूं कि हे प्रभु, यह कैसी लीला है? किस-किस से क्या-क्या करवा रहे हो? 

एक परम सेकुलर अंग्रेजी लेखक बड़ी मेहनत से किताब लिखता है और सबको जताता है कि वह हिंदू हैं, तो क्यों हैं? उस सुबह अखबार में ज्यों ही यह खबर पढ़ी, मुझे 440 वोल्ट वाला वह झटका लगा कि अभी तक संभल नहीं पाया हूं। 

दूसरा झटका तब लगा, जब एक अन्य अंग्रेजी लेखक ने आदि शंकराचार्य पर पूरी किताब लिख डाली। ऐसी ही एक बरसाती सुबह में हिंदी के एक लेखक के माथे पर तिलक देखा, तो तीसरा झटका लगा। उस शाश्वत सूने माथे पर यह सिंदूरी तिलक कैसे? मैं पूछ बैठा- साथी! आपके आधुनिकतावादी हिंदी-मस्तक पर यह उत्तर आधुनिकवादी तिलक कैसे?

वह उदात्त स्वर में बोले- समय पाय पलटै प्रति, को न तजै निज चाल। मैं बोला- आप तो परम अवसरवादी निकले? वह बोले- जब सब हिंदू हुए जा रहे हैं, तो मैं क्यों पीछे रह जाऊं? टाइमिंग ही तो असली चीज है। तुम भी लाइन में आ जाओ। मैं बोला- उम्र तो सारी कटी इश्क-ए-बुतां में मोमिन/ आखिरी वक्त में क्या खाक मुसलमां होंगे!

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  • Web Title:Sudheesh Pachauri article in Hindustan on 12 august