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मेरे साहित्यिक शुभचिंतक 

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकार

पिछले जन्म में जरूर मैंने ढेर सारे पुण्य किए होंगे। किसी भटकते साहित्यकार को राह दिखाई होगी। किसी को साहित्य में फिसलने से बचाया होगा। सबके आशीर्वाद मुझे मिले होंगे, तभी तो मुझे इस कलियुग में भी इतने शुभचिंतक नसीब हुए हैं कि वे मेरे एक-एक पल की जानकारी रखते हैं। मेरे भले-बुरे का हरदम ख्याल रखते हैं। मना भी करूं, तो नहीं मानते। कहते हैं कि हमें करने दीजिए। आपकी चिंता हमें खाए जाती है। वे हमेशा मेरे दाएं-बाएं बने रहते हैं।
एक बार मैं घर से निकला ही था कि वह चिंतातुर होकर बोले- किधर जा रहे हैं? मैंने कहा- उनसे मिलने जा रहा हूं। उन्होंने टोका- यह राइट वाली दिशा आपके लिए शुभ नहीं। यह तो हिंदुत्ववादी गली है। जाएंगे, तो लोग क्या कहेंगे? मैंने पूछा- तो? वह बोले- नहीं जाइए, राइट की रोड फिसलन भरी है। फिसल गए, तो हर-हर गंगे भी न कह पाएंगे। मैं उनकी नसीहत मानकर उल्टे पांव घर लौट आया।
फिर एक दिन निकला, तो दूसरे शुभचिंतक मिल गए। पूछने लगे- जून की इस दोपहरी में कहां चले? मैंने कहा- लेफ्ट जाना है। कुछ काम है। वह तुरंत मेरे कान में बोले- कुछ जानते भी हो? लेफ्ट वाला पुल तो न जाने कब का टूट गया? गिर-गिरा गए, तो क्या होगा? यूं भी आपकी लेफ्ट साइड पहले से ही कमजोर है। फिर उल्टे पांव लौट आया।
पिछले तीन-चार साल से यही हाल है। जब भी किसी के बुलावे पर जाता हूं, कोई न कोई शुभचिंतक मिल ही जाता है और मेरी ‘लेफ्ट-राइट’ करवाकर मुझे वापस भेज देता है। ऐसी क्वालिटी के शुभचिंतक किसके पास हैं, जो ‘बिनु काज दाहिनेहु बाएं’ आकर मदद करते रहते हैं? जब-जब बाहर निकलने का मन हुआ, किसी न किसी ने बरज दिया कि खबरदार, जो उधर गया। जाने की छोड़ें, अब तो इधर-उधर देखना भी अपराध हो गया है। मैं न जाने कब से घर में बंद हूं। कोई कहीं जाने ही नहीं देता। 
आजकल तो दरवाजे के सामने ही शुभचिंतकों ने अपने-अपने बोर्ड लगा दिए हैं- खबरदार, जो इधर-उधर गया। राइट गया, तो कम्युनल हो जाएगा। संघी कहलाएगा। लेफ्ट गया, तो देशद्रोही कहलाने लगेगा। कबीर कबीर थे। उनको रोने की सुविधा तो थी। वह कह सकते थे- चलती चाकी देख के दिया कबीरा रोय। दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।।
लेकिन हम क्या करें, जो दो नहीं, दस-दस पाटों के बीच पिसे जा रहे हैं। इधर कुआं है, उधर खाई। न कोई इधर जाने देता है, न उधर जाने देता है और बीच का रास्ता ही बंद है। यूं भी बीच में चलने में बड़ी रिस्क है। जब-जब चला हूं, मरते-मरते बचा हूं। एक बार तो बीच सड़क पर ट्रक के नीचे आने से बचा। ड्राइवर ने ब्रेक लगा दिए, वरना यह भी लिखने लायक न रहता।
कबीर के जमाने में चक्की के सिर्फ दो पाट थे। दो पाटन के बीच में कुछ दाने फिर भी बच जाते थे। इन दिनों की विचारधारात्मक चक्की में पाट-दर-पाट होते हैं। एक से बचे, तो दूसरे ने पीसा, दूसरे से बचे, तो तीसरे ने पीसा और भगवान की कृपा से फिर भी बच गए, तो साहित्यकारों की चक्की से कौन बचा है? 
इसीलिए आजकल अपने घर में बंद रहता हूं। बाईं ओर पांव उठाता हूं, तो घर के आगे रखा राइटिस्ट वाला बोर्ड कहता है- लेफ्ट जाने वाले सावधान। आगे गड्ढा है। दाईं ओर बढ़ता हूं, तो लेफ्ट वाला बोर्ड कहता है- सावधान! आगे कम्युनलिज्म का खतरा है।
क्या करूं? घर में ही लेफ्ट-राइट करता रहता हूं। 
 

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  • Web Title:Sudheesh Pachauri article in Hindustan on 10 may