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एक बडे़ लेखक की खोज में

सुधीर पचौरी

हे मेरे हिंदीप्रेमी, हिंदीसेवी, हिंदी के पाठक जन। मुझे माफ करें कि हिंदी दिवस के ऐन पहले मैं आपका दिल दुखाने जा रहा हूं और हिंदी की जगह तमिल या मलयालम की तारीफ के पुल बांधने जा रहा हूं। मगर जो सच है, उसे छिपाने से क्या? इन दिनों अगर कुछ बड़े साहित्यकार बन रहे हैं, तो या वे तमिल में हैं या मलयालम में। इनकी तुलना में फिलहाल एक भी बड़ा और असली वाला लेखक अपनी हिंदी में नहीं है।

बड़ा लेखक वह, जो बड़ा लिखे। बड़ा दिखे। उसके लिखे का असर जनता पर सीधा पडे़ और मीडिया लेखक को हाथों-हाथ ले।  फिर मामला अदालत तक जाए और अदालत  लेखक के पक्ष में खड़ी नजर आए। एक तमिल लेखक ने कोई डेढ़-दो साल पहले एक उपन्यास लिखा, जिसने प्रकाशित होते ही कुछ भावुक तत्वों की भावनाओं को ‘हिट’ किया। भावनाएं ‘हिट’ हुईं, तो उन्होंने लेखक को ‘हिट’ करना शुरू कर दिया। किताब को ‘बैन’ करने की मांग उठी। इसके कारण मीडिया में वह ऐसी बड़ी खबर बनी कि आधे-आधे पेज कई दिनों तक भरे रहे। अंत में लेखक ने जीते जी अपनी ‘मौत’ की घोषणा कर दी कि मेरा लेखक मर गया है। वह कभी न लिखेगा।

मित्रों ने लेखक की इस ‘मौत’ को बेहद सीरियसली लिया। एक जिंदा लेखक खुद को ‘मरा’ कैसे कह सकता है? सो मित्र बड़ी अदालत गए। बड़ी अदालत ने केस सुना और फैसला दिया कि नहीं, यह अभिव्यक्ति की आजादी का हनन है, यानी लेखक की कलम पर कोई नहीं बैठ सकता। उसे लिखने की आजादी है। उसे लिखना चाहिए। लेखक ने जब लिखा, तब खबर बना। जब ‘बैन’ की बात हुई, तब खबर बना और जब ‘मर’ के ‘अमर’ बना, तब खबर बना। आप हजार रिव्यू करा लीजिए, इनाम लेकर वापस कर दीजिए, पर जो शोहरत एक ‘बैन’ की मांग से या ‘विवाद’ से मिलती है, वह अन्यथा नहीं मिलती।

ऐसी ही अमरता एक मलयालम लेखक को भी अभी-अभी नसीब हुई है। इस लेखक ने मीशा (हिंदी में ‘मूंछ’) नाम से एक उपन्यास लिखा, जो एक पत्रिका में धारावाहिक हुआ। ‘मूंछ’ ने कुछ तत्वों की भावनाओं को ‘हिट’ कर दिया। पलटकर उन्होंने भी ‘मूंछ’ को हिट किया। पत्रिका ने उसे छापना बंद कर दिया। एक प्रकाशक ने मार्केट देखकर पूरे उपन्यास को  छाप दिया। यह मामला भी बड़ी अदालत तक आया। अदालत ने फिर लेखक की कलम की आजादी की हिफाजत की। यह फैसला भी मीडिया की बड़ी खबर बना। 

यानी पिछले कुछ ही दिनों में एक बड़ा लेखक तमिल ने दिया और दूसरा मलयालम ने। लेकिन हिंदी ने क्या दिया? 

कुछ दिनों बाद एक बार फिर हम सब हिंदी दिवस मनाने जा रहे हैं और हिंदी के बड़प्पन के गीत गाते हुए फोटों खिचाएंगे- हिंदी कब ‘राष्ट्रभाषा’ बनेगी? कब विश्व भाषा बनेगी? हम बिसूरेंगे और अंग्रेजी की तरह ताकतवर बनने की चिंता में दुबले होंगे, पर हिंदी में एक लेखक भी ऐसा नहीं होने देंगे, जो उक्त लेखकों के आस-पास भी पहुंच सके। यूं हिंदी में लेखकों की कमी नहीं है। एक से एक तोप-तमंचे हैं। पर सब चले हुए कारतूस की तरह खाली फुस्स-फुस्स करते रहते हैं।  

इसीलिए कहा कि हिंदी में एक भी बड़ा लेखक नहीं है। वे न नया सोच पाते हैं। न नए प्रयोग कर पाते हैं और न साहसी ही हैं। फिर भी न जाने क्यों मैं अब भी हिंदी के एक बड़े लेखक की खोज में ‘वेटिंग फॉर गोदो’ की तरह इंतजार कर रहा हूं।

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  • Web Title:Sudheesh Pachauri article in Hindustan on 09 september