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इस कारधूलि की बेला में

हे कविजन, इस ‘कारधूलि’ की बेला में कविता करने घर से बाहर कहीं न जाना। विशेषज्ञ बता रहे हैं कि दिल्ली की हवा खराब है। उसमें न जाने क्या-क्या भरा है? और हिंदी कविता में ऑक्सीजन की कमी तो पहले से ही है। अगर कविजन कारधूलि की बेला में बाहर निकलने लगें, तो कविता में खतरनाक ‘कारबन’ की मात्रा और भी बढ़ सकती है। 

मैं अपने साहित्य की चिंता करने वाला अकेला चिंतक हूं। अन्य आलोचक कविता के ‘रूप’ और उसकी ‘अंतर्वस्तु’ की चिंता करते हैं। कुछ रस, छंद, अलंकारों की चिंता करते हैं, तो कुछ प्रतिबद्धता और विचारधारा आदि की। इन सबसे अलग मैं हमेशा कवियों के स्वास्थ्य की चिंता करता हूं- कवि बचेगा, तभी न रचेगा।

एक तो दिल्ली की हवा पहले से ही खराब है और बची-खुची को दिल्ली के कवियों की ‘काव्यधूलि’ ने खराब कर दिया है। इसीलिए कविता में ‘डिप्रेसन’ बढ़ रहा है, 

‘हाइपरटेंशन’ बढ़ रहा है, ‘अनिद्रा रोग’ बढ़ रहा है, ‘घृणा’ और ‘क्रोध’ बढ़ रहे हैं। कारण है दिल्ली का ‘कारबन’ यानी ‘कार-बन’ यानी ‘कारों का वन’ और उनसे नि:सृत ‘कारधूलि’। जिस तरह दिल्ली ‘कार-बन’ है, उसी तरह दिल्ली साहित्य का ‘मधुबन’ है। मैं साहित्य के संयोजकों को भी चेता रहा हूं कि मेहरबानी करके आगे से आप लोग ‘काव्य-संध्या’ न किया करें। कविता करनी है, तो खूब करें। लेकिन या तो ‘काव्य-सुबह’ करें या ‘काव्य-प्रात:’ करें या ‘कविता-मार्निग’ करें  या ‘काव्य-नून’ करें या ‘पोइट्री-दोपहर’ करें। लेकिन ‘काव्य-संध्या’ हरगिज न करें, क्योंकि काव्य-संध्या के वक्त सर्वाधिक ‘कारधूलि’ उड़ती है, जो साहित्य के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

जिस तरह कभी इतिहास के मध्यकाल में ब्रजभूमि में ‘गोधूलि की बेला’ हुआ करती थी, उसी तरह दिल्ली में ‘कारधूलि की बेला’ होती है। जब कृष्ण दिन भर मधुबन में गायों को चराकर अपने ग्वाल-बालों के साथ वेणु बजाते हुए अपने नंद गांव को लौटते थे, तो उनकी गायों के खुरों की मार से ब्रज की धूल उड़ा करती थी, जो आसमान में छा जाती थी। लेकिन यह दिल्ली है। साहित्य की राजधानी है। यहां के गोप-गोपी सुबह कारों से दफ्तरों को निकलते हैं और शाम को एक-दूसरे से रेस करते, रोड रेज करते, ‘कारधूलि’ उड़ाते हुए लौटते हैं। कारों व पराली का धुआं और डेवलपमेंट का धूल-धक्कड़ सब एक साथ उठकर आसमान में इस कदर छाए रहते हैं कि न त्रिवेणी नजर आती है, न आईआईसी नजर आता है, न अकादेमी नजर आती है, न इंडिया गेट नजर आता है, न संसद भवन नजर आता है, न सरकार नजर आती है। 

इसीलिए निवेदन कर रहा हूं कि हे साहित्य के संयोजको, प्रायोजको, अभियोजको, आप जब भी काव्य-गोष्ठी करें, तो निमंत्रण पत्र में अपने इष्ट कवियों को यह अवश्य लिखकर भेजें कि काव्य-गोष्ठी में आएं, तो ‘मास्क’ पहनकर आएं और अपने श्रोताओं को भी ‘मास्क’ पहनाकर लाएं। जो मास्क न ला सकें, उनको संयोजक सभागार में ही मास्क प्रदान करें। मुझे जितनी चिंता कवियों की है, उससे अधिक श्रोताओं की है। अगर श्रोता ही कारधूलि के शिकार हो गए, तो हॉल कौन भरेगा?

मैं स्वयं दिल्ली की कारधूलि का मारा हूं। जिस तरह कृष्ण के विरह में कभी गोपियों के नैन निसि दिन बरसत  हुआ करते थे, उसी तरह दिल्ली की इस कारधूलि की बेला में मेरे नैन भी नित्य प्रति जलते रहते हैं। इसीलिए कह रहा हूं कि हे कवियो! दिल्ली की ‘कारधूलि’ को ‘गोधूलि’ समझने की भूल न करना।

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  • Web Title:Sudheesh Pachauri article in Hindustan on 04 november