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ये अंदर की बात है

सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार

पहले भी लिख चुका हूं और अब फिर से लिख रहा हूं कि दुनिया का सबसे बड़ा साहित्यिक इनाम देने वाली नोबेल कमेटी फिर से गहरे संकट में है। आजीवन सदस्य उसकी आफत बने हुए हैं। जीवन के आगे जब ‘आ’ लग जाता है, तो मामूली सा बंदा भी आफत बन जाता है। ऐसे ही महानुभावों के कारण नोबेल कमेटी की जान आफत में फंसी हुई है- भई गति सांप छछूंदर केरी।

पहले राउंड में जो निकाले गए या जिनको निकलना पड़ा, वे ‘आ’जीवन वाले ही थे। उनमें से कई अपने सेक्स-कांड के कारण निकाले गए। कई उनके किए पर शर्मिंदा होकर निकल गए। तब कमेटी के मारफत कहा गया कि 2018 का सम्मान इस बरस नहीं दिया जाएगा, उसे 2019 में ही दिया जाएगा। अब वही कह रहे हैं कि 2019 वाला इनाम भी संभव नहीं लगता। उनकी चिंता है कि कुछ सदस्यों की हरकतों से नोबेल सम्मान की इज्जत पर ही बट्टा लग गया है। जब तक यह दाग नहीं धुल जाता, तब तक अगला सम्मान देना संभव नहीं। सांकेतिक तरीके से कहा जा रहा है कि कमेटी में जो लोग अब भी बने हुए हैं, वे अपने आप चले जाएं। लेकिन जिनको कहा जा रहा है, वे हिल के नहीं दे रहे।

ऐसे होते हैं असली लेखक। वे साहित्य के लिए जीते-मरते हैं। विश्व साहित्य के मानक स्थापित करना उनका कर्तव्य होता है, उसे पूरा किए बिना कैसे चले जाएं? पहली बार नोबेल वालों को भी मालूम हुआ है कि असली लेखक क्या होता है और अगर कोई आजीवन कमेटी वाला हो, तो कैसा होता है? हम तो पहले से ही जानते हैं कि लेखक स्वभाव से ही चिपकू होता है। एक बार चिपक जाता है, तो फिर हटाए नहीं हटता। उसके चिपकूपन के बारे में सब जानते हैं, उसके सामने आते ही पाठक, श्रोता और समीक्षक, सब भाग जाते हैं। नोबेल कमेटी वालों की सबसे बड़ी गलती ‘आजीवन’ सदस्य बनाने की है।

लेखकों की फितरत के बारे में अगर हमसे ही पूछ लेते या इस कॉलम को ही पढ़ लेते, तो जान जाते और आजीवन सदस्य का फंदा अपने गले में नहीं डालते। बनाते, तो एक-दो साल के लिए सदस्य बनाते। दाग तो कहा ही करते थे- हजरते दाग जहां बैठ गए बैठ गए।

नोबेल के मालिकान ने तो यहां तक कह दिया है कि अब हम शायद 2019 वाला सम्मान भी न दे सकें, इसलिए चिपके मत रहो और  अपने आप ही निकल लो। लेकिन एक भी नहीं फूट रहा। सब अपनी जगह जमे हैं। 

यह है साहित्य के प्रति उनका असली कमिटमेंट। लेखक हों, तो ऐसे हों। असली साहित्यकार। अपने यहां कभी एक ‘धरती-पकड़’ हुआ करते थे। यहां तो दस के दस ‘कुरसी-पकड़’ हैं। ऐसे लोग ही असली विश्व स्तरीय साहित्यकार होते हैं।

जब से नोबेल कमेटी के कुछ सदस्यों का सेक्स-कांड खुला है, तब से हमारी नजर में दिए गए कई सम्मान संदिग्ध हो गए हैं, लेकिन एक ने भी अपना नोबेल नहीं लौटाया। जरा सोचिए, ज्यां पाल सात्र्र ने मिलने वाला नोबेल सम्मान अपने सम्मान की खातिर लौटा दिया था, लेकिन जिनको पिछले दिनों मिला है, उनमें से किसी ने नहीं लौटाया। जब से यह बेशर्म खबर आई है, सच कहूं तो मेरे लिए साहित्य के नाम पर चलती हर कमेटी संदिग्ध हो गई है।

नोबेल की ‘अंदर की बात’ वहां के एक अखबार ने आउट कर दी, तो उसकी इतनी फजीहत हुई। अगर कल को हिंदी के अंदर की बातें किसी ने आउट कर दीं, तो क्या होगा?

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  • Web Title:Sudheesh Pachauri article in Hindustan on 03 may