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हिन्दी‍-हेटर को प्रणाम

sudhish pachauri

हिंदी-हेटर हिंदी पर फिर से मेहरबान हुए हैं। इस बार कहा है कि हिंदी ने संसदीय बहसों का लेवल गिरा दिया। उनको एकदम सड़क छाप बना दिया है। असली विचार-विमर्श की भाषा तो अंग्रेजी है, उसी में बहसें होनी चाहिए।
आदरणीय हेटर जी ने हम सड़क छाप हिंदीवालों का ज्ञान यह कहकर बढ़ाया कि संसद में कोई एक तिहाई हिंदी भाषी सांसद हैं, बाकी अन्य भाषाओं के सांसद हैं, इसलिए भी हिंदी की दादागीरी नहीं चलने दी जानी चाहिए? सच कहा- दादागीरी किसी भाषा की नहीं चलनी चाहिए, अंग्रेजी की तो हरगिज नहीं। लेकिन सर जी को कोई कैसे समझाए कि संसद में अनेकों भाषाओं के बीच अंतर्भाषाई तुरंता अनुवाद की व्यवस्था है। कोई अपनी भाषा में किसी का भी भाषण सुन सकता है। हिंदी वाले चाहें, तो कोई  अन्य भाषा हिंदी में सुन सकते हैं। 
मगर हेटर जी हेटर ही रहे। उन्हें लगता है कि हिंदी तमिल के लिए खतरा है। देश की एकता के लिए खतरा है। उनकी ऐसी इंग्लिश सुनकर मुझे पहली बार अपनी हिंदी पर गर्व हुआ कि चलो, हिंदी खतरनाक तो बनी। इन दिनों तो जो जितना अधिक खतरनाक है, उतनी ही अधिक इज्जत पाता है। अगर हिंदी भी खतरनाक बन रही है, तो तय मानिए कि एक दिन उसकी इज्जत बढ़ने वाली है। उसके भाव बढ़ने वाले हैं। उसका रुतबा बढ़ने वाला है और एक दिन उसके हेटर भी उसको अपनाएंगे। यूं भी ‘हेट’ प्रेम का ही दूसरा पहलू है। जो जिससे जितना ‘हेट’ करता है, समझो उतना ही ‘लव’ करता है। इसीलिए मैं अपने प्यारे हिंदी हेटर जी का आभार जताना चाहता हूं कि आप इसी तरह हिंदी को खतरनाक बताते रहें, ताकि हमेशा दूसरों से डरने वाली और आए दिन मार खाने वाली हिंदी को भी लगे कि बहुत से लोग उससे भी डरते हैं।
हमारी जानकारी में तो हिंदी वाले हमेशा डरने के आदी रहे हैं और हिंदी भाषा दीन-हीन और कमजोरों की भाषा रही है। पहले कभी उसे उर्दू ने डराया, फिर तमिल ने डराया और बहुत दिनों तक अंग्रेजी ने डराया। एक ने कहा ‘हिंदी कोई भाषा ही नहीं है’। दूसरी भाषा ने कहा कि वह तमिल जैसी क्लासिकल भाषा नहीं है, कुल दो सौ साल पुरानी है, और अंग्रेजी ने तो हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ ही नहीं बनने दिया। 
उधर अपने हिंदी वालों ने भी हिंदी की छवि को ऐसा ही दीन हीन बनाया। कभी किसी हिंदी वाले ने उसे ‘गरीब की जोरू सब की भाभी’ कहकर उसे उपहास का विषय बना दिया। किसी ने उसे ‘गउ पट्टी’ वाला यानी ‘पिछड़ा’ मान लिया। किसी ने उसे ‘दुहाजू की लाडो’ बना दिया, यानी ‘बुड्ढे की दूसरी बहू’ बना दिया। दुहाजू की बहू होने के कारण उसे अतिरिक्त प्यार मिलता है। जितना प्यार मिलता है, उतना ही बाकी उससे जलते हैं। ‘दुहाजू’ का मतलब हिंदी का ‘राजभाषा’ होना है, जिसकी वजह से लोग समझते हैं कि उसे ‘थोपा’ जा रहा है और इस कारण वह ठुकाई खाती रहती है।
आपका बहुत कुछ आपकी आत्म छवि से तय होता है। अगर हिंदी वाले ही उसे दीन-हीन और कमजोर भाषा मानते रहेंगे, तो बाहर वाले उसे भला क्यों भाव देंगे? मैं तो कहूंगा कि अब न उसे गरीब की जोरू माना जा सकता है, और न दुहाजू की बहू। बल्कि उसे ‘खतरनाक’ ही माना जाना चाहिए।
अपना समाज भी उलटी चाल चलता है। पहले वह किसी चीज की उपेक्षा करता है, फिर घृणा करता है और उसके बाद उसे प्यार करता है। यहां जो जरा भी वक्री होता है, उससे सब डरते हैं। कहा भी गया है- वक्र चंद्रमा ग्रसे न राहू! हिंदी भी इन दिनों कुछ ‘वक्री’ हो रही है।

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  • Web Title:Satire of sudhish pachauri on Hindi