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मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ

आज समझ में आया कि जाना-माना लेखक होना भी बड़ा ‘रिस्की’ है, ‘पब्लिक इंटेलेक्चुअल’ होना तो और भी रिस्की है। हालांकि सिर्फ लेखक होने में कोई रिस्क नहीं है। लेखक होना-न-होना बराबर है। इसी तरह कोरा ‘इंटलेक्चुअल’ होने में भी कुछ नहीं। असली आफत तब आती है, जब आप ‘जाने माने लेखक’ या ‘पब्लिक इंटेलेक्चुअल’ हो जाते हैं। यही सर्वाधिक रिस्की प्वाइंट होता है, क्योंकि पब्लिक बड़ी ही ‘मूडी’ होती है, कब, कहां उसका मूड खराब हो जाए और कब किसे नजरों से गिरा दे, इसे भगवान भी नहीं जानता।

गनीमत है कि मेरे अंदर अभी तक ऐसा कोई दुर्गुण नहीं विकसा कि बडे़-बड़े ईनाम झटककर ‘जाना-माना लेखक’ बन सकूं या ‘पब्लिक इंटेलेक्चुअल’ ही बन सकूं। इसका मतलब यह नहीं कि मैं संवेदनशील नहीं हूं। अगर कोई लेखक जरा भी कष्ट पाता है या किसी से पीड़ित होता है, तो मुझे सचमुच ही साहित्यिक किस्म की मार्मिक पीड़ा महसूस होती है। कई दिन नींद नहीं आती, भूख नहीं लगती, माथा भनभनाता रहता है, किसी काम में मन नहीं लगता, एक लाइन तक नहीं लिखी जाती, ब्लडप्रेशर की गोली लेनी पड़ती है, क्योंकि हर लेखक की पीड़ा मेरी होती है और अपना लेखक समाज इन दिनों अक्सर ‘पीड़ित’ दिखाई देता है।

आप कहेंगे कि इसी बहाने मैं अपनी तारीफ किए जा रहा हूं। क्या करूं? स्वभाव से लाचार हूं, ‘संत स्वभाव’ पाया है। मुझसे एक नामी-गिरामी लेखिका का दुख देखा नहीं जा रहा। इतना नाम, मान-सम्मान, कलम की इतनी धनी कि जो लिख दें, जरूरी हो जाए। सिर्फ लेखिका नहीं, वे ‘पब्लिक इंटेलेक्चुअल’ भी हैं। आप कहेंगे कि वे तो अंग्रेजी वाली हैं, तो मेरा कहना यह है कि मेरे लिए किसी भी भाषा का साहित्यकार सिर्फ सुहृद साहित्यकार होता है। मैं भाषा का भेद नहीं मानता और अंग्रेजी वालों के प्रति तो मेरा दिल अतिरिक्त मात्र में संवेदनशील होने लगता है, क्योंकि असली लेखक अंग्रेजी वाले ही होते हैं। कहां हमारे जैसे चवन्नी छाप और कहां डॉलर छाप।

वे कुछ भी लिखते हैं, तो अखिल अंग्रेजी दुनिया उनको हाथों हाथ लेती है। लाड़ लड़ाती है और जब तब ‘बुकर’ सम्मान के लिए ‘बुक’भी करती रहती है। और वो जिसे एक बार मिल जाता है, तो लेखक तुरत ही चरम सेकुलर, परम लिबरल, विश्व नागरिक हो जाता है और ‘पब्लिक इंटलेक्चुअल’ भी कहलाने लगता है। एक-एक ट्वीट से ताकतवर सरकारों को हिलाने लगता है। ऐसे में, अगर एक भी अंग्रेजी लेखक के बारे में कोई ऐसी-वैसी बात फैलाकर उसे दुख देता है, तो मुझे दूना दुख होता है।

बताइए, कहां इतनी नामी गिरामी, प्यारी दुलारी लेखिका कि जिसका कॉलम पढ़े बिना, पढ़े-लिखे लोगों का संडे न गुजर सके, उसके बारे में देश के दुश्मन एक मुए ‘भूत’ और उसमें भी ‘पूर्व’ पाकिस्तानी राजदूत ने कह दिया कि अमुक लेखिका से मैंने वह लेख लिखवाया था, जिसमें उसने कश्मीर में ‘प्लेबीसाइट’ कराने की लाइन ली थी। वह तो अच्छा हुआ कि लेखिका ने इसका खंडन कर दिया, लेकिन इससे क्या? अपना देश तो उल्टा सोचने का आदी है, इधर तो ‘खंडन’ भी ‘मंडन’ जैसा माना जाता है। इसीलिए दुखी होते हुए भी मैं सुखी हूं कि मुझमें ऐसा एक भी गुण नहीं कि कोई मुआ राजदूत मुझे बुलाए और एक दिन गाल बजा दे कि कि इसने तब जो लिखा था, वो मैंने ही लिखवाया था, इसका क्या ईमान? ये तो ‘पेड’ लेखक है। कितना अच्छा हुआ कि ‘मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ।’
 

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  • Web Title:Hindustna Tirchi Nazar Column 18th August