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धन्य-धन्य का साइबर विमर्श

उसने एक लाइन लिखी और दस लोगों ने वाह-वाह की। फिर बाकी में से एक-एक ने एक-एक लाइन लिखी और फिर उन्हीं दस लोगों ने दस-दस बार वाह-वाह की। इस तरह दस गुना दस के बीच दस गुना दस के हिसाब से वाह-वाह हुई, लेकिन वाह-वाह से कितने दिन काम चलता? साइबर लेखक बोर होने लगे। 
 

अगली बार फिर एक ने एक लाइन किसी बड़े की मारकर और अपनी बनाकर लिख दी, तो बाकी ने कहा ‘सुंदर’, ‘बहुत सुंदर’। इतनी बार सुंदर-सुंदर हुआ कि ‘सुंदर’ शब्द ही घिस गया। फिर एक ने किसी तरह एक कविता दस कवियों की कविता को चुराकर लिख डाली, तो फिर होने लगा ‘गजब’, ‘क्या गजब की कविता है’, ‘कितनी शानदार कविता है’, ‘एकदम जानदार कविता है’, ‘ऐतिहासिक कविता है’, ‘आप सचमुच प्रातिभ हैं’। एक ने लिखा, ‘यह प्रतिभा इतने दिन कहां छिपी थी’।
 

मित्र लोग इससे भी ऊब गए, लेकिन प्रतिभा तो प्रतिभा थी, चुप कैसे रहती? सोशल मीडिया में प्रतिभा का दौरा चौबीस बाई सात चलता है। जितना फास्ट लेखन होता है, उतना ही लेखक खाली महसूस करता है। जितना खालीपन होता है, उतना ही अधिक लिखने के चक्कर में रहता है। लेखन एक मरीचिका हो उठता है।
 

कुछ दिन साहित्य में सन्नाटा रहा। फिर एक ने सन्नाटे को तोड़ते हुए घोषित किया कि रायपुर लिटफेस्ट का उसे निमंत्रण मिला है, वह अगले महीने तीन दिन वहीं होगा। एक सत्र की अध्यक्षता भी करेगा। जबाव में दस ने इमोजी लगाने शुरू कर दिए। एक ने ‘प्रणाम में जुडे़ दो हाथ’ वाले। एक ने पूरे तीन जोड़कर भेज दिए। एक ने पांच जोड़ दिए। एक ने कहा, आपका वहां जाना हिंदी साहित्य के लिए निर्णायक होगा। एक ने कहा कि मैं भी पहुंच रहा हूं, वहीं मिलेंगे। अगले रोज ‘आमंत्रित’ और ‘अनामंत्रितों’ के गुट बन गए। जो कल तक एक-दूसरे को ‘धन्य धन्य’ कहते न अघाते थे, वही एक-दूसरे को देखकर दांत पीसने लगे, लेकिन दांत पीसने का इमोजी बना नहीं था, इसीलिए कैसे दिखाते? एक लघु वैचारिक संघर्ष शुरू हो गया।
 

एक ने लिखा, आमंत्रण तो मुझे भी था, लेकिन यह रिएक्शनरी सरकार है- इस सरकार के बुलावे पर क्यों जाऊं? इस क्रांतिकारी मुद्रा को देख दस-पांच नए आ जुटे और फिर सब एक स्वर से कहने लगे, ‘धन्य’ ‘धन्य’। अंगूठा दिखाने वाले इमोजी बरसने लगे। 
 

एक ने लिखा, सही लाइन ली आपने। दूसरे ने लिखा, आपकी ड्यूटी है कि इस कठिन समय में किसी को मार्ग से विचलित न होने दें। आप अपनी मशाल जलाए रखिए। फिर एक ने लिखा, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।   दूसरा बोला, दुष्यंत की यह लाइन भला क्यों दी आपने? यही लाइन एक रिएक्शनरी नेता बोल-बोलकर चुनाव जीत गया। यह तो अब दूषित हो चुकी है। 
 

बात लाइन पर आ गई, तो लाइन टु लाइन होने लगी। एक ने कहा कि रायपुर जाना गलत क्यों? जनता का पैसा है, किसी नेता का थोड़े है। एक ने तर्क दिया कि अगर कोई बुला रहा है, तो कुछ देखकर बुला रहा है। वहां जाकर कोई क्या करता है, इसे देखो। जिनको नहीं बुलाया है, वे क्यों जलते हैं? वह कानपुर लिटफेस्ट में गया था, तो क्या हमने कुछ कहा? इस पर भी ‘धन्य-धन्य’ होने लगा। कहा गया, सही लाइन दी आपने। जनता का पैसा है, सरकार जनता की है, जनता ही तो बुला रही है। जनता बुलाए और जनता का कवि न जाए, तो जनता क्या सोचेगी? देर तक होता रहा, धन्य-धन्य।

 

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  • Web Title:Hindustan Tirchi Nazar Column on June 30