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दरबारी कवि खूब मालामाल

sudhish pachauri

हे मेरे ईश्वर, आप ही बताएं कि आपके हजूर में कुछ अरज करूं कि न करूं। ऐसी ही स्थिति एक बार कविवर बिहारी के सामने आई थी, तो उन्होंने अपने आश्रयदाता को उलाहना दिया था, कब कौ टेरतु दीन ह्वै, होत न स्याम सहाइ/ तमहूं लागी जगतगुरु, जगनाइक जग-बाइ।

याद रखें कि महाकवि बिहारी अपने वक्त के और शायद अब तक के सबसे महंगे कवि थे। उनके एक दोहे पर सोने की एक अशर्फी मिला करती थी। सिर्फ दो लाइन के दोहे पर इतना पेमेंट मिलता था, जितना आज दस पोथे लिखने पर भी नहीं मिलता। वह जयपुर के महाराजा जयसिंह के दरबारी कवि थे। उनकी रोजी-रोटी राजा-रानी की कृपा से चलती थी। तब भी जरूरत पड़ने पर वह राजा पर व्यंग्य करना नहीं भूले और उक्त दोहा कह उठे कि ‘हे प्रभु, मेरे जैसा यह दीन आपको न जाने कब से पुकार रहा है, लेकिन आप मेरी सहायता नहीं कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि हे जगद्गुरु, आपको भी दुनिया की हवा लग गई है।’

इस दोहे को देख लगता है कि या तो कवि पर कोई बड़ी विपदा आन पड़ी है या उनका पेमेंट अटक गया है। वह दोहे पर दोहे लिखे जा रहे हैं, लेकिन खजांची जी अशर्फी नहीं भेज रहे। भला किसी कवि की इतनी इनकम किसे सुहाती है? जरूर खजांची जी राजा-रानी के कान भर चुके हैं और पेमेंट रोके हुए हैं और कवि को परेशानी में डाल रहे हैं। वह रो रहा है और अपने प्रभु यानी आश्रयदाता राजा से कह रहा है कि सर जी, क्या आपको भी दुनियादारी की हवा लग गई कि ऐसे कंजूस हुए जा रहे हैं।

यह दोहा बताता है कि रीतिकालीन दरबारी कवि भी अपने आश्रयदाता की आलोचना करने को आजाद थे और कविता के जरिए अपनी बात कह सकते थे। उस वक्त के आश्रयदाता भी ऐसे आन वाले होते थे, जो कवि के ऐसे मीठे उपालंभ को सुन शर्मिंदा हो जाते थे और कवित्व के कायल होकर उसकी सराहना कर उसकी मदद करते थे। यह था भाषा का जादू। यह था कवि का भाषा पर अधिकार और कहने के तरीके का कमाल। तब के आश्रयदाता भी भाषा की तमीज रखते थे और कविता की व्यंजना को समझते थे। हमें यकीन है कि इस दोहे पर भी उनको एक अशर्फी मिली होगी।

माना जाता है कि रीतिकाल के दरबारी कवि खूब मालामाल हुए थे। लेकिन अनेक कवियों की कविताएं बताती हैं कि आश्रय में रहते हुए भी उनको बहुत सी दिक्कतें आती रहती थीं। यदि राज्य में आर्थिक संकट बढ़ता था, तो पहली कटिंग कवि के बजट की ही होती थी। बिहारी का एक और दोहा कहता है कि बिहारी को एक बार फिर ऐसे कठिन दिनों को झेलना पड़ा, थोरैं ही गुन रीझते, बिसराई वह बानि/ तुमहूं कान्ह मनौ भए आज-काल्हि के दानि।  यहां भी कि कवि अपने राजा की कंजूसी पर चोट कर रहा है, लेकिन किसी पहुंचे हुए कवि की तरह इशारा करके कह रहा है कि क्यों भगवन्! आप भी दूसरों की तरह कठोर और कंजूस होने लगे। 

हे मेरे ईश्वर, एक तो आजकल ऐसे ‘गुणग्राहक’ नहीं नजर आते, जो किसी की शिकायत का बुरा न मानें और ऐसे कवि या शिकायतकर्ता भी कहां हैं, जो ऐसी कलात्मक भाषा में शिकायत करें कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। आज के सोशल मीडिया वीरों को कोई कैसे समझाए कि प्रोटेस्ट की भाषा ‘गाली गलौज’ नहीं होती। ‘कठिन समय’ का राग अलापने वालो, यह भी तो जानो कि ‘कठिन समय में’ ही आपकी ‘प्रतिभा की परीक्षा’ होती है।

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  • Web Title:Hindustan Tirchi Nazar Column on June 23