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कुछ बनना है तो चलो दिल्ली

लेखक बनना है, तो चलो दिल्ली। ये बनना है, तो चलो दिल्ली। वो बनना है, तो चलो दिल्ली। कुछ भी बनना हो, तो चलो दिल्ली। न कुछ बनना हो, तो भी चलो दिल्ली। कवि बनना है, तो चलो दिल्ली। कथाकार बनना है, तो चलो दिल्ली। आलोचक बनना है, तो चलो दिल्ली। दिल्ली में सत्ता है। दिल्ली में पत्ता है। साहित्य का चूना-कत्था है। दिल्ली में ‘न्यूज’ है। दिल्ली में ‘व्यूज’ है। दिल्ली साहित्य में ‘कन्फ्यूज’ है। एक बार दिल्ली को भा गए, तो भा गए। एक बार छा गए, तो छा गए। दिल्ली में ताकत है। यह सबकी आफत है, पर दिल्ली है, तो राहत है। दिल्ली में इनकम है। कहीं ज्यादा, कहीं कम है।

अफसर बनना है, तो चलो दिल्ली। अफसर न बनो, तो पत्रकार ही बन जाना। पत्रकार न बनो, तो लेखक बन जाना। जब कुछ न बनो, तो पाठक बन जाना। पाठक न बनो, तो साहित्य के सत्संगी बन जाना। आयोजक-प्रायोजक-संयोजक बन जाना। इतने से ही कमा खाओगे। एक दिन साहित्य में नाम जरूर कमाओगे। दिल्ली सबको बनाती है। तुमको भी कुछ न कुछ बनाकर ही छोड़ेगी। अपने शहर में बने तो क्या बने? बने भी, तो कोई पूछेगा नहीं और छोटे शहर की एक हद होती है। दिल्ली बेहद है। अनहद है। अपने को पुछवाना है, तो चलो दिल्ली। साहित्य में कुछ भी करना हो, तो चलो दिल्ली। साहित्य में जीना है, तो चलो दिल्ली। साहित्य में पीना है, तो चलो दिल्ली। साहित्य को धरना है, तो चलो दिल्ली। साहित्य में मरना है, तो चलो दिल्ली।

जो दिल्ली आया, वही बना। वे आए, तो बने। फिर उनके दोस्त आए, तो बने। फिर उनके और उनके भी दोस्त आए, तो वे भी बने। जो बनारस से आया, उसने यहां बनारस बना लिया। जो इलाहाबाद से आया, उसने इलाहाबाद बना लिया। लखनऊ वाले ने लखनऊ बना लिया। पटना से आया, तो पटना बना लिया। भोपाल, जयपुर, कानपुर सब बन गया। हमारे जैसे हाथरसियों तक ने अपना हाथरस बना डाला।

दिल्ली बड़ी दिलवाली है। उसमें सबकी जगह है। उसे देखो, वह साहित्य का पकौड़ा बनाता है और वह साहित्य की चटनी बनाता है। वह साहित्य का परांठा एक्सपर्ट है, तो उसने हिंदी साहित्य में चाट भंडार ही खोल लिया है। वह दिल्ली आया, तो साहित्य का मालिक बन बैठा। वह आया, तो साहित्य का ठेकेदार बन गया। फिर वह आया, तो साहित्य का किराएदार बन गया। और वह पहले साहित्य का दुकानदार बना। आज वह साहित्य के मल्टीप्लेक्स का स्वामी है। उसे देखो, आज उसके पास क्या नहीं है? कविता का इंपोर्टेड ‘रिसाइकिलिंग’ प्लांट है। कहानी की ‘वाशिंग मशीन’ है। वह हर सीजन में आलोचना की ‘महा सेल’ लगाता है।

एक है, जो कथाकार बनाता है। एक वह है, जो कवियों का ‘लॉन्चपैड’ है। फीस दो और लॉन्च हो जाओ। लॉन्च की गारंटी है। उसके बाद आपकी आप जानो या आपके राम जानें। दिल्ली साहित्य का सिग्नेचर ब्रिज है। दिल्ली साहित्य का विकास मार्ग है। दिल्ली साहित्य का खान मार्केट है। दिल्ली साहित्य का मंडी हाउस है। दिल्ली साहित्य का इंडिया गेट है। दिल्ली साहित्य की फूला हुआ पेट है।

दिल्ली साहित्य की शतरंज है। दिल्ली साहित्य का स्पंज है। दिल्ली साहित्य का कंज है। दिल्ली साहित्य का रंज है। दिल्ली साहित्य का तंज है। किसी को सुनना है, तो चलो दिल्ली। किसी को गुनना है, तो चलो दिल्ली। कुछ अपना बुनना हो, तो चलो दिल्ली। किसी को धुनना है, तो चलो दिल्ली। इसलिए कहता हूं कि साहित्यकार बनना है, तो चलो दिल्ली।

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  • Web Title:Hindustan Tirchi Nazar Column on July 7