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चढ़ा हुआ लेखक बड़ा नकचढ़ा

इस उत्तर-आधुनिक परिदृश्य में महानता भी एक चुटकुला भर है। जबसे यह जाना है, ईश्वर से प्रार्थना कर रहा हूं कि हे ईश्वर, मुझे लेखक नहीं बनना और न आप बनाना, अगर बनाना ही हो, तो ‘बड़ा’ लेखक हरगिज न बनाना और बड़ा बनाना भी, तोे प्लीज ‘महान’ लेखक एकदम न बनाना। मुझे चुटकुला नहीं बनना। इसी में आपका फायदा है और मेरा भी। न मेरी बदनामी होगी, न आपकी। न मेरा कुछ बिगडे़गा, और न आपकी सृष्टि का ही।

बड़ा लेखक बनना भी मुसीबत है। पहले ‘बड़े’ बनने के लिए ‘संघर्ष’ करो। संपादक से आलोचक तक की चमचागीरी करो। फिर इसे-उसे धकियाकर ‘बडे़’ बनो। फिर जीते जी ही ‘अमरता’ के सपने देखने लगो कि मरने के बाद लोग मुझे किस तरह याद रखेंगे? जीते जी अपने नाम से एक ‘ट्रस्ट’ बना दो। बाल-बच्चों को उसमें लगा दो। एक इनाम घोषित कर दो। उसके लिए कुछ फंड जमा कर दो, ताकि ब्याज से काम चले। लोग हर बरस जयंती मनाया करें। एक सड़क लेखक के नाम पर कर दो। सड़क नहीं, तो गली ही सही। लेखक के नाम से विश्वविद्यालय बना दो। वह न बने, तो अध्ययन पीठ बना दो। अभिंनदन ग्रंथ ही निकलवा दो।

मगर इस खेल में भी बड़ा कंपटीशन है। बहुत से लेखक पहले ही अपना-अपना इंतजाम करके चले गए हैं। ज्यादातर अपने नाम से ट्रस्ट बना गए हैं, तो बहुतों ने अपने नाम से इनाम स्थापित कर दिए हैं। किसी ने घरवालों को नियत कर दिया कि हर बरसी पर श्राद्ध-समारोह करते रहें। किसी लेखक ने नहीं कहा कि उसके नाम से एक प्याऊ खुलवा दी जाए, कुआं बनवा दिया जाए या एक धर्मशाला ही बन जाए। ऐसा करते, तो जल संचयन का काम होता, प्यासे की प्यास बुझती और लेखक का नाम होता। लेकिन लेखक तो जेनेटिकली स्वार्थी होता है। अपने अलावा दूसरे की कब सोचता है?

यूं वह समाज-समाज चिल्लाता रहेगा, जनता-जनता जपता फिरेगा, न जाने कौन-कौन से संघर्ष करता रहेगा, लेकिन किसी दूसरे के लिए कुछ न करेगा। वह साहित्य-साहित्य खेलता रहेगा और दोहराता रहेगा कि साहित्य का मतलब ही है ‘सबके हित की बात करने वाला’, लेकिन जब कुछ करने की बात आएगी, तो वह सिर्फ अपने हित की करने लगेगा।

इसीलिए अपने ईश्वर से कहता रहता हूं कि मैं कुछ नहीं बनना चाहता, लेकिन ईश्वर की इन दिनों हिंदी साहित्य में चलती ही कहां है? यह तो अच्छा ही हुआ कि मुझे न कविता के ‘मि’ ने काटा, न कहानी के ‘कीट’ ने। काटा होता, तो गलतफहमी होती कि मुझे कविता से क्रांति करनी है। यह ईश्वर की ही कृपा है कि नकली, ओवर-रेटेड और यूं ही चढ़ाया हुआ कहानीकार होने के यश-लाभ व अहंकार से मैं भी बच गया।

‘चढ़ा हुआ’ लेखक बड़ा नकचढ़ा होता है। पहले कहता रहता है कि हे आलोचक मित्र, मुझे चढ़ाओ। आपने एक सीढ़ी चढ़ाया, तो कहता है, अगली भी चढ़ाओ। जब आप उसे एक मंजिल पर चढ़ा देते हैं, (यानी अकादेमी आदि दिला देते हैं) तो कहता है कि अभी एक मंजिल ही चढ़ा हूं। अभी तो और चढ़ना है। जब कोई नहीं चढ़ाता, तो ऐसा लेखक एकांत में ‘चढ़ाने’ लगता है। जब खूब ‘चढ़’ जाती है, तो गाने-बर्राने लगता है कि मैं ही कथाकार हूं। मैंने कवि-कथाकार होकर इस निरीह और अज्ञानी सृष्टि के ऊपर एहसान किया है। इस लेखकीय व्याधि से मैं ही बचा हूं, क्योंकि मैंने पहले ही अपने ईश्वर से कह दिया था कि बनाना, तो मुझे आलोचक बनाना, ताकि अपने बहाने सबकी खबर लेता रहूं।

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  • Web Title:Hindustan Tirchi Nazar Column on August 4th