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मेरे सिग्नेचर ले लेते तो...

कब से कहता आ रहा हूं कि साथी जब भी जरूरत पड़े, मेरे भी सिग्नेचर ले लेना। जनता की सुविधा के लिए घर के बाहर बोर्ड तक पर लिखवा दिया है, टॉप के ‘सिग्नेचरबाज’ का ‘सिग्नेचरालय’। इसके आगे छोटे अक्षरों में लिखा है, जब चाहें सिग्नेचर करवाएं। ‘विरोध’ में या ‘विरोध’ के ‘विरोध’ में। और ‘विरोध’ के ‘विरोध’ के भी ‘विरोध’ में कराने हों, तब भी संकोच न करें। ‘24 बाई सात की सर्विस’। सिग्नेचर करने का कोई पैसा नहीं लिया जाता।

यूं ‘अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना’ भला किसे भाता है, लेकिन जमाना ही ऐसा है कि अपने बारे में बंदा खुद न बताए, तो कोई दूसरा तो बताने से रहा। तो बची शर्म को छोड़कर और थोड़ा संकोच ओढ़कर यह बताना पड़ रहा है कि जब-जब मेरे सिग्नेचर लिए गए हैं, तब-तब विरोध सफल हुआ है। और नहीं लिए गए, तो विरोध औंधे मुंह गिरा है। बहुत दूर क्या जाना? अब इन्हीं 49 सेलिब्रिटीज के सिग्नेचरों की दुर्गति देख लीजिए। दुनिया जानती है, मैं सिग्नेचरबाजी के लिए ही इस घटिया-सी धरती पर आया हूं। इन 49 में किसी ने मुझे कष्ट न दिया और जम के मार खाए। न वे आए, न मैंने किए। मेरा क्या गया? उल्टे इनकी ही इज्जत का फलूदा बना।

तीन महीने पहले छह सौ से अधिक सिग्नेचरबाज मैदान में थे, जो जनता से कहते फिरते थे कि इसे वोट देना, उसे न देना। लगता था कि इनके सिग्नेचर जरूर रंग लाएंगे और फिर किसी के सिग्नेचरों की जरूरत न रह जाएगी। हालांकि तब भी मेरे नहीं लिए थे, लेकिन जिस तरह ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना’ बताया जाता है, उसी तरह मैं भी उपेक्षा के बावजूद दीवाना हुआ जाता था कि इस बार कुछ न कुछ होकर रहेगा। हिंदी के एक से एक तोप-तमंचे सिग्नेचर किए थे। मुझे इन तोपों-तमंचों पर पूरा भरोसा था कि चुनाव के पहले ही हारी हुई ये पुरानी तोपें चली हैं, तो कुछ तो होगा ही, लेकिन कुछ न हुआ, बल्कि उल्टा ही हुआ।

आज सोचता हूं कि अगर इन सिग्नेचरबाजों ने मेरे सिग्नेचर ले लिए होते, तो ऐसी उलटमार न हुई होती। चलो गलती हुई, सो हुई, लेकिन इस बार किसने मना किया था? लेकिन वे मेरे जैसे के सिग्नेचर क्यों लेते? मैं ठहरा हिंदी वाला। गोबरपट्टी यानी ‘बुल शिट’ वाला और वे ठहरे अंग्रेजी वाले, जो ‘बुलशिट’, ‘बुलशिट’ कहकर दिनभर ‘शिटशिटाते’ रहते हैं। उनकी नजर में ‘हिंदी वाला’ यानी ‘काउ बेल्ट’ वाला, ‘हिंदी वाला’ यानी ‘हिंदूवादी’, यानी एकदम ‘रिएक्शनरी’, ‘कम्यूनल’ यानी ‘फासिस्ट’ लिंचर। अपने यहां का ऐसा भाषाई ‘अपार्थाइड’वाला भी ‘लिबरल’ या ‘उदारवादी’ कहलाता है।

हम तो मानते आए थे कि ‘ये मेरा है, ये तेरा है’ यह सब तुच्छ बुद्धि वालों का काम है, जबकि उदार स्वभाव वालों के लिए समूची वसुंधरा ही अपनी होती है। संस्कृत में कहा भी गया है, अयं निज: परोवेति गणना लघु चेतसाम्/ उदार चरितानाम् तु वसुधैव कुटुंबकम्। लेकिन यह कौन-सी ‘उदारता’ हुई कि हिंदी वाला छोड़ दिया और देसी अंग्रेज पकड़ लिए, जो ‘लिंचिग’ में भी ‘मेरी-तेरी’ करने लगे। अगर मुझसे पूछा होता, तो इन देसी अंग्रेजों का ड्राफ्ट करेक्ट कर देता कि ‘लिंचिंग’ मेरी-तेरी नहीं होती कि मेरी वाली सही और तेरी वाली गलत। लिंचिंग किसी की हो, लिंचिग-लिंचिग है और सभी कठोर दंड के योग्य हैं। मेरे सिग्नेचर ले लेते, तो ऐसी गलती न होती। किसी ने सच कहा है- विनाश काले विपरीत बुद्धि:।

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  • Web Title:Hindustan Tirchi Nazar Column on 28th July