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आइए विक्टिम-विक्टिम खेलें

पहले राजा लोग शिकार-शिकार खेला करते थे, आज के लेखक घर बैठे या चलते-फिरते ‘शिकार-शिकार’ खेला करते हैं। राजा लोग ‘विक्टिम’ खोजने जंगल में मारे-मारे फिरा करते थे, लेकिन हिंदी के लेखक विक्टिम खोजने कहीं नहीं जाते, बल्कि खुद को ही विक्टिम या ‘शिकार’ की तरह पेश करते हैं।इन दिनों हिंदी के कई लेखक पढ़ने-लिखने की जगह ‘विक्टिम-विक्टिम’ खेला करते हैं। विक्टिम माने बेचारा या सताया हुआ। ‘विक्टिम खेलना’ एक पूरी ‘विचारधारा’ है। दशकों तक विचारधारा का अवगाहन करते हुए ही कई हिंदी लेखकों ने विक्टिम-विचार के अमोघ मंत्र की खोज की और उसका सफलता से इस्तेमाल भी किया। आजकल जिसे देखो, वही लेखक खुद को हिंदी साहित्य का विक्टिम बताता हुआ बिसूरने लगता है कि ‘हाय, देखो तो इसे ‘ये’ मिल गया। उसे ‘वो’ मिल गया। मुझे क्या मिला? हिंदी वाले ऐसे ही घटिया हैं कि सब कुछ ‘अपात्रों’ को देते हैं। यहां किसी भी सच्चे लेखक की कद्र नहीं है। मैं दस विदेशी भाषाओं में अनूदित हूं, बीस देशों में निनादित हूं। लेकिन ये हिंदी वाले मेरी कीमत नहीं जानते। इन्होंने मुझे हमेशा सताया है। देखना, जब एक दिन मेरे जैसा लेखक यूं ही विदा हो जाएगा, तब हिंदी वालों को समझ में आएगा कि उन्होंने क्या खो दिया?’

यह है ‘विक्टिम-विचारधारा’। बिना इसे पुष्पित-पल्लवित किए लेखक के विक्टिम होने की पहचान नहीं होती। इसका मतलब यह नहीं है कि जो विक्टिम है, उसे किसी ने पकड़कर धुन दिया है कि वह थाने में एफआईआर लिखाने जा रहा है। विक्टिम होना कुछ-कुछ ‘अंदर’ की बात है। यह ‘बाहर घाव न दीखई, भीतर चकनाचूर’ वाली स्थिति है। विक्टिम होना एक बात है, अपने को विक्टिम महसूस करना दूसरी बात। लेकिन सबसे बड़ी बात है, हर समय अपने को विक्टिम की तरह पेश करना और इसी ‘विक्टिमहुड’ को सामने वाले को बेच देना। इस विक्टिमहुड के ‘हाय बिचारे’ तत्व का बड़ा मारकेट है। हाय बिचारापन विचारधारा से भी अधिक बिकता है। हिंदी में ऐसे कई लेखक हैं, जिनको उनकी योग्यता से बहुत अधिक और बहुत पहले मिल गया है। ऐसे ही लेखक इन दिनों सबसे अधिक ‘विक्टिम-विक्टिम’ खेलते हैं।

वे इसी कला की बदौलत साहित्य में जन्म लेते ही ‘भाभू’ हो लिए। फिर इसी कला के जरिए उन्होंने हिंदी साहित्य में ‘करीअर’ के लिए जरूरी अगले ‘सोपान’ यानी ‘श्रीव’ को झटक लिया। फिर इसी कलाकारी से ‘पहल’वान बन गए और इसके बाद भले वे आज तक ‘आदमी’ न हुए हों, पर ‘अकादेमी’ तो हो ही गए। विक्टिम-साधना’ के साधक कई प्रकार के हैं। कुछ ‘सहज साधक’ हैं, तो कुछ ‘कृच्छ साधक’। कुछ ‘हीन यानी’ हैं, तो कुछ ‘महायानी’। कुछ के महाभागों को यह ‘साधना’ बचपन में आ जाती है। कुछ को पचपन में आती है, लेकिन कुछ प्रतिभाहीनों को न यह बचपन में आती है, न पचपन में ही आ पाती है।

जब आपके बाल पकने लगते हैं और जब अपनी कार लेकर किसी महाभाग के निजी ड्राइवर बन जाते हैं, तब उस्तादों की सिद्ध की हुई विक्टिम-कला आपको सहज आ जाती है। मगर हिंदी में कुछ ऐसे भी अभागे हैं, जिनको विक्टिम-कला आजीवन नहीं आती। ऐसे ही लेखक इन दिनों मोदी से लड़ने का सबसे अधिक दावा करते हैं। एक ओर दस्सी-पंजी के इनामों के लिए रोना, दूसरी ओर ताल ठोकना। कैसी तो ‘शौर्य मुद्रा’ है? तो आइए, कुछ देर हम भी ‘विक्टिम-विक्टिम’ खेलें। 

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  • Web Title:hindustan tirchi nazar column on 08 September