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एक अद्भुत अपूर्व मेनिफेस्टो

Sudheesh Pachauri

हर कवि, कथाकार और आलोचक के पास दो-चार एकड़ का मकान हो, जो सेंट्रली एअरकंडीशंड हो। फलदार पेड़ों से भरा एक बड़ा उद्यान हो, जिसमें कवि के श्रमहार के लिए जगह-जगह झूले पड़े हों। एक क्रीड़ा पर्वत हो, जहां शुक सारिकाएं छंद सुनाते हों, जिसमें बेला महका री महका, आधी रात को, किसने घंटी बजाई आधी रात को  वाला गाना बजता हो। तीसरे प्रहर में साहित्यिक चरचाएं होती हों, जिनमें राजा या नेता हिस्सा लेते हों और प्रात: मुहूर्त में नए-नए छंद सिरजे जाते हों।

यदि आप आचार्य राजशेखर द्वारा ऊपर गिनाई कुछ जरूरतों को पूरा न कर सकें, तो इतना ही कर दें कि हर लेखक को एक अच्छी नौकरी दिला दें, जिसमें लेखक को कोई तंग न करे। वह जब चाहे आए, जब चाहे जाए और चाहे तो न भी आए, लेकिन उससे जबावतलबी कोई न करे। रिटायर हो, तो मोटे पीएफ के साथ एक मोटी पेंशन मिलती रहे और बाल-बच्चे दून संस्कृति में पढ़ येल, हार्वर्ड या आईवी लीग के संस्थानों में स्कॉलरशिप के सहारे अध्ययन कर, एमएनसीज में बड़ी पगार पर लग जाएं। 

ऐसी सांस्कृतिक पारिस्थितिकी बनाई जाए, जिसके जरिए हर कवि-कथाकार व आलोचक की पत्नी जी प्रथम क्षण से फेमिनिस्ट नजर आएं। क्लासीकल साड़ियों से लेकर ईथनिक मेहंदी और तांबूल रचना-शिल्प के स्पेशल शो करती हों, जो 18वीं सदी के गहनों के उद्धार के लिए सुख्यात हो चुकी हों। और जो संस्कृत-हिंदी के साथ अमेरिकी उच्चारण वाली अंग्रेजी बोल सकें। इन कुछ मांगों के अलावा, आज के लेखकों को साहित्य के नए-नए ‘सहेट स्थल’ यानी ‘मिलन स्थल’ भी चाहिए, जहां वे देर तक बिना परेशान हुए अड्डा मार सकें। आप मानें न मानें, हमारी नजर में लुटियंस वाली दिल्ली के सारे ‘सहेट स्थल’ पुराने पड़ गए हैं। जहां रिटायर्ड थके-हारे अड्डेबाज अपने-अपने ‘अतीत के चलचित्र’ दुहराते रहते हैं। वही प्याला, वही हाला। आपसी ज्ञान-चरचाएं भी घिसी-पिटी सी नजर आती हैं।

हम देश के दलों और नेताओं से अरज कर रहे हैं कि मां सरस्वती के इन वरद पुत्रों यानी कवियों-लेखकों को ‘ऐवेंई’ न समझें, बल्कि हमारी बताई मांगों को अपने मेनिफेस्टो में जगह दें। अगर नहीं देंगे, तो इनका शाप लगेगा। ध्यान रखिए, लेखक बड़े काम के होते हैं। ये सुखी, तो आप सुखी और आपका संसार सुखी, और ये दुखी, तो आप दुखी... इनको खुश रखेंगे, तो आपके भूत, वर्तमान और भविष्य, सब खुश नजर आएंगे। नाखुश रखा, तो समझो आप तो तीनों लोकों से गए। एक बार उनकी भृकुटि टेढ़ी हो गई, तो समझिए कि आपकी सात पुश्तों का इतिहास खलास। ये अनुकूल, तो दुनिया अनकूल। कहा भी गया है जहां न पहुंचे रवि, तहां पहुंचे कवि। इस नजर से लेखक तो चौकीदारों का भी ‘चौकीदार’ है। 

विभिन्न दल और उनके नेता इन दिनों अपने घोषणा-पत्र बना रहे हैं। हमारा निवेदन है कि वे वक्त रहते हमारी उक्त मांगों को जगह दें और उनको पूरा करने का वादा करें। आचार्य राजशेखर की मांगों को पूरा न कर सकें, तो न करें, लेकिन हमारी इन न्यूनतम मांगों को पूरा करने का वादा अवश्य करें। कुछ को राजकवि/ राजकवयित्री, कुछ को देश-प्रदेश कवि बना दें। लेखक-लेखिकाओं के लिए कुछ हजार फ्लैट, कुछ हजार कारें, कुछ हवाई यात्राएं फ्री कर दें, कुछ हजार लखटकिया वजीफे, बच्चों की शिक्षा फ्री और इलाज आदि फ्री कर दें, फिर देखें हमारे लेखक आपको क्या से क्या बना देते हैं?

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  • Web Title:Hindustan Tirchi Nazar Column March 24