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26 मई, 2020|1:01|IST

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अपना सदाबहार चिरकुट कल्चर

सुधीर पचौरी

जैसे ही देश भर में लॉकडाउन हुआ और दिल्ली की कई सड़कों व आनंद विहार के बस अड्डे पर लॉकडाउन के भय से पलायन कर रहे दिहाड़ी मजदूरों की भीड़ दिखी, वैसे ही हजारों हिंदी वालों की ‘कारयित्री प्रतिभा’ जाग उठी। वे अपनी रचना पाठ, अपने भाषणों के वीडियो की लाइव स्ट्रीमिंग कर हमारा उद्धार करने में लग गए।
एक स्वयं को ‘सा’ से ‘साहित्यकार’ मानने वाला कहता कि हाय! देखो तो, इन ‘लौंग मार्च’ करने वाले गरीबों का आज मेरे सिवा कौन है? अपने-अपने बच्चों को गोद में और सिर पर जरूरी सामान लिए हजारों-हजार भूखे-प्यासे मेहनतकश अपने गंतव्य की ओर पैदल ही चले जा रहे हैं। पैरों में छाले पड़ गए हैं। किसी को दो सौ, किसी को चार सौ, तो किसी बारह सौ किलोमीटर जाना है। और देखो, इनकी चिंता मेरे अलावा किसी को नहीं। लॉकडाउन का फायदा सिर्फ मध्यवर्ग के लिए है, गरीब जाएं भाड़ में।
एक अन्य उद्धारक वाट्सएप पर मेरा उद्धार करने आ गए और मुझे चेताने लगे कि संकट की इस घड़ी में सिर्फ मुझे देखो, मुझे सुनो और मुझे पढ़ो यानी मुझे झेलो। इन चुनौती भरे दिनों में अकेला मैं हूं, जो उनके लिए और उनसे अधिक तुम्हारे लिए अपनी फेसबुक पर मरा जा रहा हूं कि कहीं तुम दिशाहीन न हो जाओ।
इतने में ‘एक बटे तीन’ छाप कवि अपनी विज्ञप्ति भेजने लगा कि वह सुबह इतने से इतने बजे तक, दोपहर इतने से इतने तक और शाम को इतने से इतने बजे तक अपनी रचनाओं को लेकर अपने फेसबुक पर लाइव रहेगा। आप उसे सुनें और अपना कल्याण करें।
इतने में एक ‘आदि विद्रोही’ कवि अचानक एनजीओ बनकर मेरी ‘शेम-शेम’ करते हुए मुझे धिक्कारने लगा कि इधर मैं इस जनता के लिए मरा जा रहा हूं और तू...घर में बंद है? अब भी वक्त है कि तू जनता से जुड़ जा। जनता से नहीं, तो मुझसे ही जुड़ जा, नहीं तो मेरी कविता से जुड़ जा, पर जुड़। मेरी कविता तुझे जनता से जोड़ देगी, नहीं तो मुझसे जोड़ देगी, तभी तू इतिहास में कुछ नाम काम पाएगा। याद रख कि जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी इतिहास!
एक ही दिन में मेरे वाट्सएप पर एक-एक करके क्रांति और करुणा के हजारों सागर लहराने लगे। उनके ‘कारुण्य कांड’ के शुरू में दो मिनट के लिए जनता आती, फिर वे खुद पधार जाते, फिर उनकी रचना पसर जाती और कहते बेट्टा, लॉकडाउन के बंद घरों के इन दिनों में मेरी कविता-कहानी से बचकर, अब तू जाएगा कहां? घर में बंद होकर तू कोरोना से भले बच ले, लेकिन मेरी कविता, कहानी और भाषणों से कैसे बचेगा? 
लॉकडाउन ने सबको ज्ञानी, उपदेशक, उद्धारक और मुक्तिदाता बना दिया। जिनको कभी न श्रोता मिले, न पाठक मिले और न दर्शक, उनके भी दिन फिर गए और घर में बंद हम जैसे निरीह श्रोताओं-पाठकों-दर्शकों के पीछे पड़कर गाने लगे- अजी रूठकर अब कहां जाइएगा/ जहां जाइएगा हमें पाइएगा! 
आप लाख मना करें, समझाएं कि भैये! साहित्य तुम्हारे बस का नहीं, उस पर तरस खाओ। लेकिन वह हिंदी वाला ही क्या, जो किसी की माने और मौका मिलते ही साहित्यकार व समाज-उद्धारक बनने की न ठाने? सो इधर लॉकडाउन हुआ, और उधर हर किस्म का चिरकुट अपना रिजेक्टेड-डिजेक्टेड माल लेकर फेसबुक पर आ बैठा और हम जैसे अज्ञानियों को चेताने लगा कि ‘जाने वाले, तेरा धियान किधर है, ज्ञान की असली दुकान इधर है।’  यही है अपना सदाबहार चिरकुट कल्चर।

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  • Web Title:hindustan tirchi nazar column 5th april 2020