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तिरछी नज़रउदारमना हिंदी और कमेटी साहित्य

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकारPublished By: Manish Mishra
Sat, 27 Mar 2021 09:15 PM
उदारमना हिंदी और कमेटी साहित्य

हिंदी में दो प्रकार के लेखक होते हैं। एक, ‘कमेटी लेखक’; दूसरे, ‘नॉन-कमेटी लेखक’। कमेटी लेखक भी तीन तरह के होते हैं- कुछ ऐसे होनहार होते हैं, जो हर कमेटी के लिए अनिवार्य होते हैं। दूसरे वे होते हैं, जो दरवाजा तोड़कर कमेटी में घुस जाते हैं और तीसरे वे होते हैं, जो अपने आप में चलती-फिरती कमेटी होते हैं।
कमेटी के लिए अनिवार्य लेखक का व्यक्तित्व और कृतित्व कमेटी में आने के बाद खिलता है। वह कमेटी में आता है, तो ट्रैवेलिंग चार्ज लेता है। जाता है, तब ट्रैवेलिंग चार्ज लेता है। कमेटी बैठती है, तो ‘सीटिंग चार्ज’ लेता है। ऐसे हरेक लेखक की कामना होती है कि कमेटी की मीटिंग लंबी चले, कम से कम दो-तीन दिन तक तो चले ही। नहीं चलती, तो वह चलवा देता है, ताकि दो-तीन दिनों तक पांच सितारा ऐश लूटता रहे और आवन-जावन व सीटिंग का मोटा भत्ता पक्का करता रहे। उसके भक्त उसकी हर ख्वाहिश का ख्याल रखते हैं। ऐसे लेखकों की आजीविका कमेटी से ही चलती है। 
ऐसे लेखक ‘कमेटी टु कमेटी’ काम करते हैं। वे कमेटियों के स्थाई भाव की तरह होते हैं। अगर कमेटी में न रखे जाएं, तो  फौरन बीमार पड़ जाते हैं। किसी अनिष्ट के भागीदार बनने की आशंका से घबराकर कमेटी वाले उनको फिर से रख लेते हैं। इनके बरक्स जो नॉन-कमेटी वाले लेखक होते हैं, वे हमारे जैसे अयोग्य, नाकारे और एकदम नालायक होते हैं, जो अपने ‘अवगुणों’ के कारण किसी कमेटी में नहीं रखे जाते, न रखे जा सकते हैं। कमेटी-लेखक अलग से पहचाना जाता है। उसके भक्त उसे साहित्य का ईश्वर मानकर उसका ‘अर्चनम् पादसेवनम्’ करते रहते हैं। उनकी टेबल पर ‘वीआईपी/ रिजव्र्ड’ लिखा रहता है, जिस पर मक्खी तो बैठ सकती है, पर कोई अन्य लेखक नहीं बैठ सकता। खान-पान के बीच जिस टेबल को सबसे अधिक लेखक घेरे हों, समझ लीजिए कि वह ‘कमेटी टेबल’ है। कैमरे भी उसी की ओर देखते रहते हैं। लेकिन जो लेखक अपनी तिकड़म से गेट तोड़कर कमेटी में घुस आते हैं, उनकी महिमा पहले वालों से भी अधिक होती है। ऐसे लेखक से सब डरते हैं। कमेटी में उसका आतंक होता है, क्योंकि वह कभी भी विवाद खड़ा कर सकता है। ऐसे कमेटी लेखकों को बाकी कमेटी लेखक ‘ब्लैकमेलर’  समझते हैं, लेकिन उनका रुतबा भी मानते हैं। तीसरी श्रेणी उन लेखकों की होती है, जो अपने आप में एक चलती-फिरती कमेटी होते हैं। ये आचार्यनुमा होते हैं। वे तोल-मोल करके बोलते हैं। उनका एक-एक वाक्य आप्त वाक्य की तरह लिया जाता हैं। उनका उठना, बैठना, हंसना, खांसना, छींकना, सब विद्वत्ता का पर्याय  माना जाता है। वे जब-जब मुस्कराते हैं, हिंदी में ‘नोबेल’ आता दिखता है। ऐसे आचार्यों के सात तो क्या, हिंदी वाले सात सौ खून माफ कर देते हैं। इस मामले में हिंदी वाले बेहद उदारमना होते हैं। ऐसे आचार्य को लोग समकालीन दंद-फंद, वर्ग-संघर्ष और जाति-संघर्ष से परे मानते हैं। अगर वह ‘लेफ्ट’ रहा है और चलते-चलते साहित्य के मोदी युग में ‘राइट’ की ओर देखने लगा है, तो उनके भक्त इसे भी सिद्धांत का जामा पहना देते हैं कि वे जो आज करते हैं, बाकी हिंदी साहित्य दस साल बाद करता है। जरा देखो, वैचारिक संकट की इस घड़ी में भी उन्होंने मार्ग दिखाया! सोचता हूं, मैं भी अपने को एक चलती-फिरती कमेटी बना लूं। अपना उपनाम ‘कमेटी’ रख लूं और एक दिन अपने को ‘आचार्य’ घोषित करके ‘सही मार्ग’ दिखाता रहूं।

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