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तिरछी नज़रगमले-वमले लेता जा, दस पर्सेंट देता जा

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकारPublished By: Naman Dixit
Sat, 20 Mar 2021 11:02 PM
गमले-वमले लेता जा, दस पर्सेंट देता जा

पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी तो अपनी मौज में कह गए कि बसंत आ गया है। फिर केदारनाथ अग्रवाल ने ‘बसंती हवाबाजी’ कर डाली : हवा हूं हवा, मैं बसंती हवा हूं।  लेकिन मैं अपना दुखड़ा किससे कहूं कि इसी ‘बसंती हवाबाजी’ के चक्कर में मैं कई लाख की चोट खाए बैठा हूं, जबकि अपने पंडिज्जी ठहाका मारकर कहे जा रहे हैं कि बसंत आ गया है। 
अबे काहे का बसंत और काहे की बसंती?
बसंत ऋतु जब भी आती है, परम विरही की तरह मुझे तरसाकर चली जाती है। यह बसंत मेरे लिए फूल नहीं खिलाता, बल्कि मुझ जैसों को ‘फूल’ बनाता रहता है। मार्च का महीना मेरे लिए बड़ा ही मारक होता है। इन्हीं दिनों सारी दुखदाई खबरें हवा में तैरती हैं, और जब-तब कान में कह जाती हैं- बेटा, तू इस बार भी रह गया। अब करता रह अगले मार्च तक इंतजार।
अब यह दुखदाई नहीं तो क्या है? जिसको इधर आना था, उधर चला गया और एक नहीं, दो नहीं, तीन-तीन चले गए। सोचता हूं, एक दिन आईटीओ पुल,  निजामुद्दीन-अक्षरधाम वाले पुल, डीएनडी, लोहे वाले पुल और सिग्नेचर ब्रिज समेत जितने जमुनापारी पुल हैं, सब पर अपने बंदे बिठा दूं और बता दूं कि जमुना पार करने वाली हरेक गाड़ी से साहित्य का टोल टैक्स वसूलें कि बेटा, आगे बढ़ने से पहले ‘टेन परसेंट’ इधर रखता जा। शॉल-दुशाले लेता जा, गमले-वमले का बोझ तुझे मुबारक, लेकिन कैश का दस प्रतिशत इधर देता जा। लेकिन क्या करूं? हिंदी का साहित्यकार हूं। स्वभाव से उदार हूं। रो सकता हूं, किसी को रुला नहीं सकता। सो जो होता है, होने देता हूं, बाकी भगवान भरोसे छोडे़ रखता हूं और कोरी उम्मीद जीता हूं, क्योंकि फैज अहमद फैज के शेरों ने मुझ जैसों को आशावादी बना दिया है। इसलिए उनके ही एक शेर की ‘पैरोडी’ बनाकर अपने मन को बहलाता रहता हूं : ‘दिल ना-उम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है/ लंबी है गम की मार्च, मगर मार्च ही तो है।’ क्या करूं? मार्च मेरे लिए है ही मारक। यही महीना है, जब हिंदी साहित्य की कमेटियों का ‘मिलन’ होता है और वे बडे़-छोटे, खरे-खोटे, सब किस्म के साहित्यकारों में से कुछ के दरवाजे खटखटाती हैं। फिर किसी को ‘इक्कीस हजारी’, किसी को इक्यावन हजारी’ और किसी को ‘लखटकिया’ बनाने के लिए उसकी ‘हां’ लेती हैं और अगले रोज अखबार चिढ़ाने लगते हैं, ‘तुझे इस बार भी किसी ने न पूछा’। अगर किसी ‘गैर-दुश्मन’ को मिले, तो कोई बात नहीं, किसी दुश्मन को मिलता है, तो मेरी कैफियत दिल ही तो है  फिल्म के राज कपूर की सी हो जाती है :
तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं
तुम किसी और को चाहोगे तो मुश्किल होगी।
और मुझे अपने गुरुजी पर घनघोर गुस्सा आने लगता है, जिन्होंने रटा दिया था कि बेटे, कर्म करना, फल की चिंता कभी न करना। मैं कर्म करता रहा और सारे निकम्मे फल तोड़कर ले गए। कर्म करूं मैं, माल काटे कोई और। वाह रे ‘कर्मफलवाद’!
अब बस एक ही आस बची है कि अकादेमी ने सही लाइन पकड़ ली है। कुछ बरसों से वह हिंदी साहित्य में ‘स्त्रीत्ववाद’ का परचम लहराने लगी है। इसे देखकर हिंदी के मर्दवादी लेखक भिनभिना रहे हैं, जबकि नारीवादी लेखिकाएं चहक रही हैं। मैं खुश हूं, चलो, अभी ‘नारीवादी’ लेखिकाओं का नंबर लग रहा है, कल मुझ जैसे ‘स्त्रीत्ववादी’ का भी नंबर आएगा। आज कविता का नंबर लगा है, तो कल आलोचना का भी आएगा, यानी अपना भी टाइम आएगा।

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