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भूखे पेट होय न कविता-कहानी

सुधीश पचौरी  हिंदी साहित्यकारPublished By: Manish Mishra
Sat, 18 Sep 2021 09:03 PM
भूखे पेट होय न कविता-कहानी

एक वरिष्ठ लेखक ने एक कनिष्ठ लेखक से बातचीत के बदले नकद नारायण मांगे, तो हिंदी साहित्य के हलके में हाय-हाय मच गई। देखो तो! वह लेखक होकर पैसे मांगता है? यह भी कोई लेखक है? बिकाऊ है। बताइए, जरा सी बातचीत के बदले पैसे मांगता है!
मजे की बात यह है कि ऐसा कहने वाले आज के पूंजीवादी युग में रहते हैं, जहां कुछ भी फ्री नहीं होता, लेकिन लेखक से चाहते हैं कि वह फ्री में मिले। आज हर चीज का दाम फिक्स है। साबुन, पानी, तेल, खाना, बिजली, कागज, पेन, मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट, आना-जाना, यानी जीवन की हर चीजके दाम हैं, लेकिन हिंदी साहित्य ‘बेदाम’ है, और शायद इसीलिए ‘बेदम’ भी है।
जमाना बदल गया। सामंतवाद की जगह नया पूंजीवाद आ गया। आधुनिकतावादी की जगह उत्तर-आधुनिकतावादी जमाना आ गया, पर अपनी हिंदी में न साहित्यकार बदला, न साहित्य के बारे में सोच बदली। दुनिया उलट-पलट हो गई। साहित्य के मुद्दे बदल गए। साहित्य की भूमिका बदल गई। अवधारणाएं बदल गईं, लेकिन नहीं बदला, तो साहित्य को लेकर सोच! इसे कहते हैं कि जीना कलियुग में, लेकिन लिखना सतयुग में।
इनकी नजर में साहित्य क्या है? वह समाज की सेवा है और फ्री की सेवा है। लेखक तो सबका हित करने के लिए होता है, जबकि सबका हित करने के चक्कर में उससे किसी का हित नहीं हो पाता! हिंदी में साहित्य का मोल क्या? अजी, वह तो अनमोल होता है। तब साहित्यकार क्या है? वह तो समाज के प्रति समर्पित होता है। वह देना जानता है, लेना नहीं। वह समाज से अपने लिए कुछ नहीं मांगता। जिस तरह प्रकृति किसी से कुछ नहीं मांगती, वह भी नहीं मांगता। कहा भी गया है वृक्ष कबहुं नहि फल भखे, नदी न संचै नीर/ परमारथ के कारण, साधु धरा शरीर।।  लेकिन यह शरीर तो बहुत कुछ मांगता है। लेखक भी पेट के लिए खटता है। मेहनत करके कमाता है, तभी जी पाता है। जिएगा, तभी तो साहित्य करेगा, वरना हो लिया लेखन और हो लिया साहित्य।
इसलिए हे प्रभु! हिंदी के लेखक को लेखक ही रहने दो। साधु न बनाओ। और हे लेखक भाई! तुम भी अब इस आत्मछल को छोड़ो कि लेखक ‘सबका’ होता है। खुलकर कहो कि लेखक सबसे पहले अपना होता है, फिर किसी और का होता है, क्योंकि लेखक देवता नहीं, आदमी होता है, जिसे भूख लगती है और जिस तरह से कभी किसी ने कहा था कि भूखे भजन न होय गोपाला, उसी तरह लेखक भी यह कह सकता है कि ‘भूखे पेट होय न कविता-कहानी’।
जरा पश्चिम के साहित्य और साहित्यकारों को देखो। वहां न हर बंदा साहित्यकार होता है, न हो सकता है, जबकि अपने यहां जो-जो ठलुआ या बेकार है, वही साहित्यकार है। अब जब लेखकों की ‘डिमांड’ से ज्यादा ‘सप्लाई’ होगी, तब उनके दाम क्या लगेंगे? उनका तो अवमूल्यन होगा ही।
पश्चिम में ऐसा भेड़िया धसान नहीं है कि कुछ किया न धरा, बन गए लेखक। पश्चिम में साहित्य की कीमत है। वहां एक से एक ‘रेटेड’ लेखक होते हैं। उनकी किताबों की बिक्री उनकी रेटिंग तय करती है। उनकी किताब को बेचने वाले अलग होते हैं, प्रमोट व पब्लिसिटी वाले अलग। 
उनका मीटर चालू रहता है। उसी के हिसाब से उनको पैसा मिलता है। हिंदी साहित्य का अपना मीटर कब चालू होगा प्रभुजी!

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