DA Image

तिरछी नज़रआओ दुश्मन-दुश्मन खेलें

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकारPublished By: Manish Mishra
Sat, 08 May 2021 11:07 PM
आओ दुश्मन-दुश्मन खेलें

पहले साहित्यकार एक-दूसरे से परिचित हुआ करते थे। वह ‘ऑफलाइन’ लेखकों का जमाना था। साक्षर भी कम होते थे, सो लेखक और पाठक भी गिने-चुने होते थे, सब एक-दूसरे को जानते होते थे। ऐसे साहित्यकार सबके मित्र हुआ करते थे। सब एक-दूसरे को ससम्मान पत्र लिखा करते थे। एक-दूसरे से मिलने-जुलने आते-जाते थे, वह साहित्य में दोस्ती का जमाना था। साहित्यकार अपनी मित्र मंडली से जाना जाता था। फिर साहित्य में ऐसा दौर आया, जब साहित्यकार एक-दूसरे से हलो करने की जगह एक-दूसरे से पूछने लगे, ‘तय करो, किस ओर हो तुम? इस तरफ या उस तरफ? और अगर कोई कहता कि मैं किसी तरफ नहीं, तो फतवा दे दिया जाता कि आप भी दुश्मन हुए।’
आज साहित्यकार अपने दोस्तों से नहीं, दुश्मनों के नाम से पहचाना जाता है। आपका साहित्यकार होना इससे तय होता है कि आप किसे अपना दुश्मन मानते हैं? दुश्मनी का सूत्र सीधा सादा है : अगर मेरा दुश्मन तेरा दुश्मन नहीं, तो तू मेरा भी दुश्मन हुआ। ये तो आल्हा उदल वाला भाव हो गया, जिसमें कहा गया है- जाके बैरी सम्मुख जीवैं, ताके जीवन को धिक्कार! जब से कोरोना काल आया है, तब से हमारे प्रिय कवि भइया जी को दुश्मन ढूंढ़ने की बीमारी हो गई है। वह साहित्य में हर वक्त एक दुश्मन ढूंढ़ते रहते हैं। जब कोई नहीं मिलता, तो जो सामने पड़ जाता है, उसी से कहने लगते हैं, मेरा दुश्मन तुम्हारा दुश्मन। यदि ऐसा नहीं मानते, तो तुम भी हमारे दुश्मन हुए। जाओ, मर जाओ। मैंने अपने कवि जी  से कहा कि इतने दिन बाद आपसे फोना-फोनी हो रही है, कुछ अच्छी लगने वाली बातें करिए। कोरोना के रूप में आजकल मौत तो यूं ही गली-गली घूम रही है, हमारे आपके कई प्रिय साहित्यकारों को वह अपने साथ ले जा चुकी है। इसलिए जब तक हम साहित्यकार हैं, तब तक हम जिंदगी की बात करें, तो बेहतर!
कविजी बिफर गए : तुम हद दरजे के  कायर हो। तुमसे भी निपटना होगा।
मैं हैरान कि पिछले बरस के कोरोना काल में तो भइया जी ठीक-ठाक थे, उनकी कविताओं की चर्चा करता था, तो खुश हो जाते थे और मुझे ‘रेमंड विलियम्स’ कहते थे और अब मेरे मरने की कामना कर रहे हैं! मैंने उन्हें याद दिलाया-मेरे प्रिय कवि! यूं ही लाखों लोग कोरोना के कारण अकाल काल-कवलित हो चुके हैं। जो बचे हैं, वे राम-राम करके दिन काट रहे हैं और आप ऐसे में भी ‘मारण उच्चाटन’ के मंत्र जप रहे हैं? साहित्यकार होकर ऐसी मृत्यु-साधना क्यों कर रहे हैं? साहित्यिक दुुश्मन से लड़ना है, तो उसके विचारों से लड़ो, यह कैसी वैचारिक फाइट है? जैसे कंचे खेलने में बच्चे का कंचा पिट जाता है, तो वह खिसियाकर कंचा पीटने वाले को ‘चोर’, ‘तू मर जाए, तेरा बाप मर जाए’ आदि कहकर कोसा करता है, उसी तरह आप कोस रहे हो, गुस्से को थूक दीजिए, जरा हल्के हो जाइए! इस समय इतना नकारात्मक भाव आपकी सेहत के लिए ठीक नहीं है। इससे आपकी इम्यूनिटी कमजोर होती है। इसलिए जब भी बात करें, पॉजिटिव बात करें, वरना वही वाली बात हो जाएगी, जो शतरंज के खिलाड़ी कहानी में मीर और मिर्जा के साथ हुई थी, जब अंग्रेजों की फौज अवध पर कब्जा करने आ रही थी, उस समय वे दोनों शतरंज की बाजी जीतने के लिए एक-दूसरे के जानी दुश्मन बने हुए थे! इसलिए हे मेरे प्रिय कवि! आज हम सबका दुश्मन कोरोना है। पहले इससे निपट लेते हैं, फिर आप हमसे निपट लेना।

संबंधित खबरें