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तिरछी नज़रअब लौं नसानी अब न नसैहों

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकारPublished By: Manish Mishra
Sat, 03 Apr 2021 09:20 PM
अब लौं नसानी अब न नसैहों

मन कर रहा है कि अपने मोहल्ले के दर्जनाधिक मंदिरों में अब नियमित रूप से जाया करूं। गणेश जी की वंदना किया करूं। सभी देवी-देवताओं की आरतियां गाया करूं। प्रसाद चढ़ाया करूं। शनि महाराज को तेल चढ़ाऊं, ताकि मेरे साहित्य के ‘शनि’शांत हो जाएं। नवग्रहों की परिक्रमा करूं, ताकि मेरे साहित्य के सारे ‘राहु-केतु’शांत रहें। मंगल और शनि को हनुमान चालीसा का पाठ करूं और चोला चढ़ाऊं। राम जी की कृपा कि मुझे अब ‘सेकूलर’ होने का ‘ताबीज’ मिल गया है। मैं तो अंदर ही अंदर डरता रहता था कि अगर किसी सेकूलर साथी ने मेरे माथे पर कभी तिलक लगा देख लिया, तो मुझे ‘कम्यूनल’ कहकर साहित्य के इतिहास से फौरन बाहर निकाल देगा। मैंने अब तक इसी डर को जिया है, लेकिन अब लगता है कि मंदिर जाना इन दिनों सेकूलर होने की गांरटी है, क्योंकि कोलकाता से केरल तक हर कहीं एक से एक ‘सेकूलर साथी’ मंदिर-मंदिर घंटी बजाते, टीका लगवाते नजर आते हैं और फिर भी ‘कम्यूनल’ नहीं कहलाते! कम्यूनल सेकूलर बना जा रहा है और सेकूलर कम्यूनल बना जा रहा है और  इस तरह सब कोई आधा कम्यूनल, आधा सेकूलर और अंत में ‘सुपर सेकूलर’हुआ जा रहा है। सोचता हूं, मैं भी हो जाऊं! सब ‘जय श्रीराम’की लीला है! इसीलिए इन दिनों मन तुलसी  के उस पद को याद करके गाए जा रहा है :अब लौं नसानी अब न नसैहों रामकृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिर न डसैंहों। यानी हे प्रभु! अब तक जीवन नष्ट किया, अब न करूंगा। आपकी कृपा से मेरी सांसारिक रात्रि खत्म हो गई है, अब न सोऊंगा। मंदिर जाकर ‘सुपर सेकूलर’बनूंगा। प्रभु! यह आपकी लीला नहीं तो और क्या है कि एक नारे ने बड़े-बडे़ सेकूलरों को ‘मंदिर प्रेमी’ बना दिया। जो कभी मंदिर की ओर ताकते तक न थे, अब दौड़ लगाते दिखते हैं। जो चंडी पाठ भूल गए थे, अब पब्लिकली इसका पाठ करते दिखते हैं। अब तक मैं भी शरमाता था, लेकिन अब न शरमाऊंगा। मंदिर जाऊंगा, भजन गाऊंगा। जब बडे़-बडे़ सेकूलर मंदिर में धोक लगाकर भी सेकूलर कहलाते हैं, तो भला मैं क्यों नहीं कहला सकता? 
जरा देखिए तो, जो कल तक जय श्रीराम कहने से हिचकते थे, अब जय-जय सियाराम जपने लगे हैं। जो सात पुश्त के सेकूलर थे, माथे पर तिलक लगाने लगे हैं और सन चौबीस तक तो चोटी रखकर गाने लगेंगे : 
मैया मेरी कबहि बढैगी चोटी! 
सब राम जी की लीला है कि ‘जय श्रीराम’ जैसे‘हिंदू सबाल्टर्न’ नारे ने सारे ‘सेकूलरों’को ‘भक्त’बना दिया है। कोई हनुमान चालीसा पढ़ता हुआ दिखता है, तो कोई चंडी पाठ करते दिखता है। सब राम जी की कृपा है कि अपनी जड़ों से उखड़ा हिंदी साहित्य भी अब अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है और कोलकाता से लेकर चेन्नई वाया त्रिवेंद्रम तक हर कोई जय-जय सियाराम कहता हुआ अपने को धन्य-धन्य करता दिखता है। तुलसी बाबा ने कभी कहा था, कलियुग केवल नाम अधारा।  इन दिनों तो हमें सब कुछ जय श्रीराम अधारा दिख रहा है। इसीलिए मेरा मानना है कि यह हिंदी साहित्य का ‘मोदी युग’है। बकौल साही-नामवर, नई कविता के केंद्र में ‘नेहरू’ थे। बाद की कविता के केंद्र में ‘इंदिरा’ रहीं, तो अब भला ‘मोदी’ क्यों नहीं हो सकते? मैं एडवांस में बता रहा हूं। यही होना है। फिर न कहना कि बताया नहीं!

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