DA Image
हिंदी न्यूज़   ›   ओपिनियन  ›  तिरछी नज़र  ›  मुश्किलों से लड़ना है, तो हंसो और हंसाओ

तिरछी नज़रमुश्किलों से लड़ना है, तो हंसो और हंसाओ

सुधीश पचौरी हिंदी साहित्यकारPublished By: Manish Mishra
Sat, 01 May 2021 09:57 PM
मुश्किलों से लड़ना है, तो हंसो और हंसाओ

इन दिनों हंसना मना है, लेकिन मैं हंसना चाहता हूं और आपको भी हंसाना चाहता हूं, क्योंकि इन दिनों हंसना जरूरी है - हंसी एक थैरेपी है, थैरेपियों की थैरेपी है। डर और निराशा के माहौल में यही एक आशा है! इस कोरोना काल में डॉक्टर बताते हैं कि ऑक्सीजन का लेवल बढ़ाना है, तो योग करो, प्राणायाम करो, अनुलोम-विलोम करो, पेट के बल लेटकर गहरी सांस लो, ये करो, वो करो!
मैं कहता हूं कि हंसो और हंसते रहो, हंसाते रहो! हंसी के तीन दुश्मन हैं : एक महाबली, दूसरा कोरोना और तीसरे, जिनको भगवान ने हंसने वाला दिल नहीं दिया यानी हिंदी के रोंदू साहित्यकार! दुनिया भर के महाबली हंसी से इसलिए डरते हैं, क्योंकि उनको लगता है, हंसने वाला उन्हीं की खिल्ली उड़ा रहा है!  कोरोना भी हंसने वाले लोगों से चिढ़ता है, क्योंकि अगर आदमी हंसेगा, तो उसका ऑक्सीजन लेवल बेहतर हो जाएगा, उसकी इम्यूनिटी तगड़ी हो जाएगी और अगर ऐसा हुआ, तो कोरोना रुलाएगा किसे? कोरोना कहता है कि हंसना मना है! मैं कहता हूं कि हंसना जरूरी है, वो मुंह पर मास्क लगवाता है, ताकि आप हंसते-खुश होते न दिखें! लेकिन मैं कहता हूं, मास्क लगाकर भी हंसो! कोरोना हंसी का दुश्मन है, और क्यों न हो, वो है वुहानी और हंसी ठहरी रूहानी! हंसी अपने आप में एक पूरी थैरेपी है, वह तनाव कम करती है, अवसाद को भगाती है, ऑक्सीजन बढ़ाती है। कोरोना-पूर्व के दिनों में पार्कों में ‘हास्य क्लब’ चला करते थे, लोग सुबह-सुबह इकट्ठे होते और कुछ ‘एक्सरसाइज’ करते और फिर जोर से और देर तक ठहाके पर ठहाके लगाते रहते! 
उनके पास से जो गुजरता, वह भी हंसने लगता! हंसी छूत की तरह फैलती है, हंसने वाले को देखकर बाकी भी हंसने लगते हैं। इसीलिए कहता हूं कि कोरोना से लड़ना है, तो हंसो और हंसाओ! पार्क में नहीं हंस सकते, तो घरों में हंसो-निराशा और अवसाद के घटाटोप को हल्का करने के लिए हंसो। कवि रघुवीर सहाय ने हंसो-हंसो जल्दी हंसो  नामक संग्रह में इसी शीर्षक से एक बड़ी मानीखेज कविता लिखी थी, मैं उसी की ‘पेरोडी’ करते हुए कहता हूं : 
‘हंसो कि कोरोना से लड़ना है / मास्क लगाकर भी हंसो, / हंसो कि ऑक्सीजन कम न हो,/ हंसो कि जब तक वैक्सीन लगे,/ तब तक हंसो। / हंसो कि कोरोेना की सुनामी के आगे सारे महाबली बेकार साबित हुए। / हंसो आपस में लड़ते हुए नेताओं पर हंसो। / हंसो कि उन्होंने सबको भाग्य भरोसे छोड़ दिया / हंसो कि हंसी ही इस दुष्ट कोरोना का इलाज है!’ 
हंस कर देखिए : हंसी से फेफड़े खुलते हैं और इम्यूनिटी तगड़ी होती है! ये मैं नहीं, विशेषज्ञ कहते हैं, ‘लॉफ्टर थैरेपी’ वाले कहते हैं! कोरोना मनुष्य मात्र का शत्रु है, इसीलिए तो मुंह पर मास्क लगवा देता है, बाहर निकलने से मना करता है और फेफड़ों की ऑक्सीजन को सोख लेता है। इसीलिए तो मैं कहता हूं कि हंसो, कोरोना काल में भी हंसो और देर तक हंसते रहो! घोर दु:ख की घड़ी में भी हंसो कि हंसी एक उपचार है! हंसो और जोर से हंसो! जब तक ऑक्सीजन पर्याप्त मात्र में सप्लाई हो, तब तक हंसते रहो! हंसने के लिए जरूर जगह निकालो और हंसो कि हंसने में कोई पाई पैसा नहीं लगता! यह एकदम फ्री है और अपने हाथ में है, हास्य कवियों को सुनो, ‘स्टेंड अप’ कॉमेडियन को सुनो। और कुछ न मिले, तो ‘तिरछी नजर’ पढ़कर हंसो और मुस्कुराओ!

संबंधित खबरें