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चलो मन खान मारकेट तीर

sudhish pachauri

जब से ज्ञानियों ने ‘खान मारकेट गैंग’ को खोजा और कोसा है, तब से एक हीनताग्रंथि मुझे खाए जा रही है कि रे नालायक, अब तक क्या किया, साहित्य क्या जिया कि ‘खान मारकेट गैंग’ में शामिल तक नहीं हुआ। अगर तू भी ‘खान मारकेट गैंग’ वाला होता, तो तेरा भाव भी बढ़ गया होता और हिंदी का भाव भी। पर तू पता नहीं किस कोने में हिंदी साहित्य को घिसता रहा और सोचता रहा कि किसी पारखी की नजर तुझ पर पडे़गी और उसके कोसने से तेरे लोक-परलोक, दोनों संवर जाएंगे। लेकिन किसी ने जरा भी लिफ्ट नहीं दी।

उधर बिना कुछ किए धरे, बिना साहित्य घिसे, खान मारकेट के सत्संगियों ने न केवल अपना नाम कमा लिया, बल्कि ‘खान मारकेट गैंग’ जैसा देवोपम नाम पा लिया। वे खान मारकेट में धूनी रमाकर धन्य हुए और तू ‘मंडी हाउस’ के गोल चक्कर ही मारता रहा। बहुत हुआ, तो कभी ‘त्रिवेणी’ में बैठ लिया और इससे भी अधिक जोर मारा, तो दरियागंजवी राजेंद्र यादव तक चला गया। आखिर रहा, तो हिंदी वाला ही न। किसी ने जोश दिला दिया, तो आईआईसी हैबीटेट में पहुंच गया, लेकिन ‘खान मारकेट गैंग’ जैसी कीर्ति को न छू सका।

इस तरह एक बार फिर तू पिछड़ गया। ‘खान मारकेट गैंग’ कुचर्चित होकर भी सुचर्चित हो गया और तू अपना कोई गैंग तक न बना सका। जब से ‘खान मारकेट गैंग’ की चर्चा छिड़ी है, खान मारकेट के भाव चढ़ गए हैं। दुनिया की जुबान पर अगर कोई एक नाम है, तो खान मारकेट का है। क्या है यह खान मारकेट?

यह ज्ञानी-गुमानी जनों का एक क्लासी अड्डा है। सत्ता और ज्ञान की कॉकटेल है। दिल्ली की सारी महानता यहीं विचरती है। वह देसी अंग्रेजों का ‘सहेट स्थल’ या कहें कि ऐसा प्राइवेट ‘मिलन स्थल’ है, जहां सखा-सखी भाव से ज्ञानीजन अंग्रेजी में नित्य विहार किया करते हैं। यहां दिल्ली के देसी अंग्रेज मृदु मंद-मंद अमेरिकी-अंग्रेजी यानी ‘अंम्रेजी’ उच्चारण में दो हजार रुपये की काफी विद केक पर देश के भविष्य पर नित्य ही दिव्य चिंतन करते हैं। यह ऐसा निरापद अड्डा है, जहां महंगे से महंगे और पल-पल हवा-हवाई ज्ञानीजन अपनी-अपनी पोर्श्च, ऑडी, मेबेक और वोल्वोज से उतरकर मारकेट में इस तरह से प्रवेश करते हैं, जैसे देवजन देवलोक में प्रवेश करते हैं।

यह वह अड्डा है, जहां अमेरिका-यूरोप से ज्ञान की बोरियां उतरती हैं और ज्ञान के पिपासु पचास-सौ डॉलर देकर लेटेस्ट अमेरिकी ज्ञान की कुंजी लेकर जब बाहर आते हैं, तो किताब का कवर ऊपर की ओर रखकर हम जैसे अज्ञानियों को चौंकाते हुए निकल जाते हैं और हम ‘ज्ञान तो निकल गया, गुबार देखते रहे’ जैसे अफसोस से भर जाते हैं। किसी के कर कमल में स्टीवेन लेवित्से की हाउ डेमोक्रेसीज डाई  शोभित होती है, तो किसी के कर कमल में सोशन्ना जुबोफ की द एज ऑफ सर्वेलेंस कैपिटलिज्म  विराजती है। पिकेटी तो घर की मुर्गी हैं यहां। अगली शाम वही ज्ञानीजन आईआईसी या हैबिटेट में हमारे जैसी पिछड़ी पब्लिक के बीच इसकी लपसी बांट रहे होते हैं और हम चाट रहे होते हैं कि अब आया सरउ ‘संकटवा’ पकड़ में। यही वजह है कि जब से ‘खान मारकेट गैंग’ चर्चा में आया है, तभी से मन गा रहा है- ‘अरुण, यह खान मारकेट हमारा।/ जहां पहुंच लुटियंस वालों को मिलता एक सहारा।’

अपनी हिंदी भी खान मारकेटी होती, तो तमिल वालों के हाथों ऐसे न पिटती। सारा खान मारकेट तमिल वालों के पीछे पड़ जाता। मजाल है कि कोई हिंदी को हाथ लगाता। इसलिए, चलो मन खान मारकेट तीर।

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  • Web Title:Hindustan Tirchi Nazaj Column On June 9