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यही तो हिंदी का बड़प्पन है

Sudheesh Pachauri

हिंदी एक बार फिर ठुकी। हिंदी एक बार फिर पिटी। हिंदी एक बार फिर हीन बनाई गई, लेकिन हिंदी फिर भी कुछ नहीं बोली। पचपन से साठ करोड़ की भाषा कुछ तमिल नेताओं से पिटती रही, फिर भी कुछ न बोेली। हिंदी विज्ञापनों की रोटी खाने वाला अंग्रेजी मीडिया भी हिंदी को ठोकता रहा, हिंदी फिर भी कुछ न बोली।
एक देसी अंग्रेज बोला कि हिंदी कुल दो सौ साल पुरानी है और तमिल पांच हजार साल पुरानी, लेकिन हिंदी ने कुछ न कहा।

हम अपनी हिंदी में इन अनाड़ी देसी अंग्रेजों को कैसे समझाएं कि अब तो अपनी समझ दुरुस्त कर लें कि हिंदी ग्यारह सौ साल पुरानी भाषा है और उसकी माताश्री संस्कृत जी भी पांच हजार साल पुरानी हैं, तब अपने पुरानेपन की हेकड़ी क्यों दिखाते हो जी? एक अंग्रेजी भाषाविद् बोले कि हिंदी ने 48 बोलियों को अपने में मिलाया हुआ है, वरना वह कुल 33 करोड़ की भाषा है। अरे भाई, हिंदी भाषा का ‘बलक्नाइजेशन करने’ (‘टुकडे़ टुकड़े’ करने) वालों में आप तो पहले ही खूब नाम कमा चुके हैं। आपके उकसाने से भी हिंदी से उसकी बोलियां अलग नहीं हुईं।

फिर हिंदी के एक धुर हिंदी-विरोधी तमिल नेता ने फरमाया कि हमने हिंदी थोपने का पहले भी विरोध किया है और फिर करेंगे। सच कहें, तो बेचारी हिंदी को क्या मालूम कि कौन उसे किस पर थोप रहा है। कोई ऐसा कर रहा है, तो हमारा उससे इतना ही निवेदन होगा कि हिंदी पर ऐसी मेहरबानी न करें। भाषाओं के स्पद्र्धात्मक बाजार में हिंदी जिस गति से आगे बढ़ रही है, आगे भी बढ़ती रहनी है।

लेकिन इसी बीच हिंदी का कथित ‘विरोध’ औंधे मुंह आ गिरा। हिंदी के अंधविरोध की पोलपट्टी को अंग्रेजी मीडिया ने ही खोला। ‘दक्षिण भारतीय हिंदी प्रचार सभा’ के आंकडे़ देकर अंग्रेजी मीडिया को यह ‘सत्य’ स्वीकार करना पड़ा कि तमिलनाडु में स्वेच्छा से हिंदी सीखने वालों की संख्या में पिछले पांच वर्षों में छह गुना बढ़ोतरी हुई है। इन दिनों तमिलनाडु के छह लाख से अधिक लोग स्वेच्छा से हिंदी पढ़ते हैं। बहुत से तमिलों को स्पष्ट होने लगा है कि बाहर जाकर कुछ कमाना है, तो उसके लिए हिंदी सीखनी जरूरी है। वहां तो हिंदी बिना किसी सरकारी सपोर्ट के ही बढ़ रही है।

तमिलनाडु का आम आदमी अपना भविष्य हिंदी पढ़ने में देखता है, लेकिन कुछ तमिल नेता हिंदी का अंधविरोध करके तमिलभाषी आम जनता को अपने घेरे में ही बंद रखना चाहते हैं। केरल ने तो हिंदी का महत्व पहले ही समझ लिया था, इसीलिए वहां बहुत से लोग हिंदी खूब पढ़ते हैं और हिंदी क्षेत्र में काम करते हैं। इसकी शुरुआत माक्र्सवादी नेता ईएमएस नंबूदिरीपाद ने कभी यह सोचकर की थी, ताकि मलयालम भाषी हिंदी पढ़कर हिंदी क्षेत्र में आसानी से रोजगार पा सकें। लेकिन उस वामपंथी छात्र संगठन को क्या कहें, जो अपने नेता नंबूदिरीपाद की हिंदी-नीति मानने की जगह उसी के विरोध में खड़ा हो गया।

जब गरज पड़ती है, तो बडे़-बड़े हिंदी-विरोधी तक हिंदी बोलने लगते हैं। देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बने, तो एक बार हिंदी में ही बोले थे। जयललिता ने एक टीवी चैनल में राजकपूर की फिल्म का एक गाना गाकर अपने हिंदी प्रेम को दर्शाया था। पर कमल हासन, रजनीकांत और अन्य तमिल हीरो हिंदी से कमाई करके भी हिंदी का विरोध करते हैं। इस अंधविरोध के बावजूद हिंदी किसी से कुछ नहीं कहती, क्योंकि वह जानती है, छिमा बड़न को चाहिए छोटन को उतपात/ कह रहीम हरि का घट्यौ जो भृगु मारी लात। यही उसका बड़प्पन है।

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  • Web Title:Hindustan Tirchi Nazaj Column On June 16